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मानव सेवा ही, माधव की सेवा है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Aug 30, 2025
  • 3 min read

Aug 30, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, निश्चित तौर पर आपने तुलसीदास जी का यह दोहा कभी ना कभी सुना ही होगा, “तुलसी दया ना छोड़िए, जब तक घट में प्राण…!!”, मेरी नजर में यह धार्मिक उपदेश से ज्यादा जीवन का गहरा सत्य है या यूँ कहूँ मनुष्य रूपी जीव को दिल से इंसान बनाने का अचूक सूत्र है। हम सभी ने बचपन से ही सुना है कि “दया धर्म का मूल है” लेकिन कहीं ना कहीं आज की पीढ़ी इससे दूर नजर आती है। जबकि आज के प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ से भरे इस बदलते युग में, युवाओं के लिए इस संदेश को अपनाना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।


ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि युवावस्था वह समय है जब ऊर्जा, जोश और महत्वाकांक्षा अपने शिखर पर होती है और इस वक्त सब अपने करियर, सपनों और रिश्तों की दौड़ में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि दूसरों के प्रति संवेदनशील होना भूल जाते हैं। लेकिन असल इंसानियत यही है कि हम अपने जीवन की दौड़ में भी दूसरों की मदद के लिए रुकना सीखें।


सोच कर देखिए, अगर सड़क पर कोई बुजुर्ग व्यक्ति आपसे मदद माँगता है और आप उसे नज़रअंदाज़ करके निकल जाते हैं, तो इंसान और मशीन में क्या फर्क रह जाएगा? पर वही मदद यदि आप कर दें, तो न केवल उस बुजुर्ग को राहत मिलेगी, बल्कि आपके दिल को भी संतोष मिलेगा। यही संतोष जीवन की असली कमाई है।


हमें आज के युवाओं को यह सोच विकसित करने में मदद करना होगी। हमें उन्हें सिखाना होगा कि सफलता सिर्फ ऊँचाई छूने से नहीं, बल्कि रास्ते में दूसरों को सहारा देने से भी मिलती है। आज अगर आपके पास धन नहीं है तो चिंता की कोई बात नहीं, आप किसी की सड़क पार कराने में मदद कर सकते हैं, किसी भूखे को रोटी खिला सकते हैं, किसी रोड पर पड़े पत्थर को हटाकर दूसरों को चोट लगने से बचा सकते हैं। याद रखना दोस्तों, दया का कार्य हमेशा बड़ा होना ज़रूरी नहीं, बल्कि सच्चा होना ज़रूरी है। वैसे भी आज के डिजिटल युग में करुणा दिखाना, जरूरतमंदों की मदद करना आसान है। आप वृद्धाश्रम, अनाथालय या किसी जरूरतमंद संस्था को ऑनलाइन सहयोग कर सकते हैं। और यह भी सच है कि दया केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं, बल्कि आपके शब्द, आपका व्यवहार और आपकी सहनशीलता भी दया के ही रूप हैं।


सहमत ना हों तो कभी किसी भूखे बच्चे को खाना खिलाकर या किसी दुखी व्यक्ति को हौसला देकर देख लीजिएगा। आप ख़ुद ही महसूस करेंगे कि इस पुनीत कार्य ने आपके भीतर एक अलग ही ऊर्जा जगाई है। वैसे इस कार्य का एक और अनोखा फायदा है, जब आप किसी का दर्द बाँटते हैं, तब आपका खुद का बोझ भी हल्का हो जाता है।


इसलिए मैं युवाओं को यह समझाना जरूरी मानता हूँ कि दया कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। यह वह शक्ति है जो हमें पशु-पक्षियों से अलग करती है और इंसान को इंसान बनाती है। आज दुनिया को केवल सफल लोगों की नहीं, बल्कि दयालु और संवेदनशील युवाओं की आवश्यकता है।


याद रखिएगा, मानव की सेवा ही माधव की सेवा है। मंदिर जाकर पूजा करने से ज़्यादा पुण्य तब मिलता है जब आप किसी पीड़ित की मदद करते हैं। यदि हम दया को अपने जीवन का हिस्सा बना लें, तो न केवल समाज बेहतर होगा, बल्कि हमारी आत्मा भी सच्चे अर्थों में संतुष्ट होगी। तो प्रिय दोस्तों, आज यह संकल्प लीजिए कि चाहे हालात जैसे भी हों, अपने जीवन में दया का स्थान कभी नहीं छोड़ेंगे क्योंकि यही सच्चे धर्म और सच्ची सफलता की पहली सीढ़ी है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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