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हृदय में प्रेम हो तो समर्पण अपने आप ही आ जाता है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 18 hours ago
  • 3 min read

July 30, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, दुनिया का हर रिश्ता किसी-न-किसी स्वार्थ से जुड़ा हो सकता है, लेकिन ईश्वर से जुड़ा प्रेम ऐसा होता है जिसमें पाने की नहीं, केवल समर्पण की इच्छा होती है। इसीलिए केवल मंदिर जाने, पूजा या मंत्रोचार करने को सच्ची भक्ति नहीं माना जाता है।सच्ची भक्ति तो तब जन्म लेती है, जब ईश्वर हमारे जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का आधार बन जाते हैं। चलिए, भगवान राम से जुड़ी एक सुंदर कथा से इसे समझने का प्रयास करते है।


एक मान्यता के अनुसार एक दिन प्रभु श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ पंपा सरोवर के किनारे विचरण कर रहे थे। तभी लक्ष्मण ने देखा कि एक कौआ बार-बार पानी के पास आता, चोंच झुकाता, लेकिन बिना पानी पिए लौट जाता। उसकी बेचैनी देखकर लक्ष्मण ने भगवान श्रीराम से इसका कारण पूछा। इस पर भगवान श्रीराम मुस्कुराते हुए बोले, “लक्ष्मण! यह मेरा नाम जपने में इतना समर्पित है कि इसे डर है कि पानी पीते वक्त एक क्षण के लिए भी राम नाम का स्मरण छुट ना जाए। इसलिए यह अपनी प्यास सह लेता है, लेकिन अपने प्रेम की धारा नहीं रोकता।”


दोस्तों, यह कथा केवल एक पक्षी की नहीं, बल्कि प्रेम की सबसे ऊँची अवस्था की है। जब प्रेम सच्चा होता है, तब त्याग कठिन नहीं लगता। एक माँ रात-रात भर जागती है, लेकिन उसे यह त्याग नहीं लगता। एक सैनिक महीनों परिवार से दूर रहता है, लेकिन उसे यह बलिदान भारी नहीं लगता। एक कलाकार वर्षों अभ्यास करता है, लेकिन उसे वह परिश्रम बोझ नहीं लगता। क्योंकि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ कष्ट भी अर्थपूर्ण हो जाता है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। संत मीरा ने राजमहल छोड़ दिया, हनुमान ने अपना संपूर्ण जीवन रामकाज में समर्पित कर दिया और स्वामी विवेकानंद ने अपना यौवन मानव सेवा में लगा दिया। इन सबके पीछे इनकी कोई मजबूरी नहीं थी, बल्कि प्रेम था।


इसीलिए दोस्तों, प्रेम को ऐसी शक्ति माना गया है, जो असंभव को सहज बना देती है। लेकिन आज हमारी भक्ति का स्वरूप बदल गया है। हम ईश्वर को याद तो करते हैं, पर अधिकतर तब, जब कोई समस्या आ जाए। हमारी प्रार्थनाएँ भी अक्सर इच्छाओं की सूची बन जाती हैं। यदि मनोकामना पूरी हो जाए तो श्रद्धा बढ़ जाती है, और यदि न हो तो शिकायत शुरू हो जाती है। मेरी नजर में दोस्तों यह भक्ति नहीं, लेन-देन है।


याद रखिएगा, सच्ची भक्ति वह है जिसमें ईश्वर साधन नहीं, साध्य बन जाते हैं। जहाँ नाम केवल होंठों पर नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहार में उतर आता है। जहाँ मंदिर से लौटने के बाद भी हमारे शब्दों में विनम्रता, कर्मों में ईमानदारी और व्यवहार में करुणा दिखाई देती है। इसी बात के महत्व को समझाते हुए कबीर जी ने कहा था, “प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाय।” अर्थात् जहाँ सच्चा प्रेम है, वहाँ अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता। भक्ति का पहला कदम ही अहंकार को छोड़ना है। इसलिए दोस्तों, प्रश्न यह नहीं है कि हम दिन में कितनी बार भगवान का नाम लेते हैं। प्रश्न यह है कि क्या हमारा जीवन भी उस नाम के योग्य बन रहा है या नहीं? हमारे कर्म, हमारे विचार और हमारा व्यवहार उस भक्ति की गवाही दे रहा है या नहीं?


याद रखिएगा, सच्ची भक्ति का प्रमाण केवल जप की संख्या नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है। जब ईश्वर के प्रति प्रेम हृदय में उतर जाता है, तब त्याग कठिन नहीं लगता, सेवा बोझ नहीं लगती और हर परिस्थिति में मन शांत रहने लगता है क्योंकि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ समर्पण अपने आप आ जाता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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