वचन से बड़ा विवेक है !!!
- Nirmal Bhatnagar

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July 29, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, भारतीय संस्कृति में वचन का महत्व कितना ज़्यादा है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि “प्राण जाए पर वचन न जाए” को हम केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र की पहचान मानते हैं। इसी वजह से मन में यह प्रश्न उठना, “क्या हर परिस्थिति में केवल वचन निभाना ही धर्म है? या फिर क्या विशेष परिस्थितियों में वचन से बड़ा विवेक हो जाता है?”, लाज़मी ही है। आइए, आज हम इस प्रश्न का उत्तर महाभारत से खोजने का प्रयास करते हैं।
महाभारत में देवव्रत ने अपने पिता की खुशी के लिए सिंहासन का त्याग किया और आजीवन ब्रह्मचर्य का भीषण व्रत लिया। उनके संकल्प की महानता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि देवताओं ने भी इसकी प्रशंसा की थी और इस त्याग ने ही उन्हें “भीष्म” बना दिया। लेकिन समय के साथ वही प्रतिज्ञा उनके जीवन का सबसे बड़ा बंधन बन गई। भीष्म जानते थे कि दुर्योधन का मार्ग उचित नहीं है। साथ ही वे पांडवों के सद्गुणों से भी परिचित थे। वे धर्म-अधर्म-राजधर्म के भी अच्छे ज्ञाता थे। लेकिन फिर भी अपनी प्रतिज्ञा और राजधर्म की अपनी समझ के कारण वे द्रौपदी के अपमान के समय मौन खड़े रहे। उनका यह व्यवहार आज भी लोगों के मन में प्रश्न खड़ा करता है।
दोस्तों, भीष्म धर्म की समझ होने के बाद भी ख़ुद को प्रतिज्ञा और राजधर्म की समझ से मुक्त नहीं कर पाये। इससे हम स्पष्ट तौर पर समझ सकते हैं कि कभी-कभी श्रेष्ठ उद्देश्य से लिया गया निर्णय भी बदलती परिस्थितियों में नए मूल्यांकन की माँग करता है। इसी बात को समझाते हुए प्रसिद्ध प्रबंधन विचारक पीटर ड्रकर ने कहा था , “जिस काम को अब किया ही नहीं जाना चाहिए, उसे पूरी निष्ठा से करते रहना भी बुद्धिमानी नहीं है।
मेरी नजर में यह बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। इस दुनिया में कई परिवार केवल इसलिए टूटते रहते हैं क्योंकि वे वर्षों पुराने अहंकार को “सिद्धांत” का नाम दे देते है। अनेक संस्थाएँ इसलिए पिछड़ जाती हैं क्योंकि वे पुरानी नीतियों को बदलने से डरती हैं। इसी तरह कई लोग ऐसे करियर, रिश्ते या निर्णयों से चिपके रहते हैं जो अब उनके विकास में बाधा बन चुके हैं। उन्हें लगता है कि पीछे हटना कमजोरी है, जबकि कई बार दिशा बदलना ही परिपक्वता होती है।
दोस्तों, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि जीवन में कोई भी कठिनाई आते ही हम अपने सिद्धांत बदल दें। इसका अर्थ केवल इतना सीखना है कि सिद्धांतों का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना होता है, उसे जकड़ना नहीं। इसलिए याद रखें, जब भी कोई निर्णय न्याय, करुणा और व्यापक हित के विरुद्ध जाने लगे, तो उसका पुनर्विचार करना पलायन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। इसी बात को समझाते हुए महात्मा गांधी जी ने कहा था, “सत्य की मेरी समझ जैसे-जैसे विकसित होती है, मेरे विचार भी बदलते जाते हैं।” उनके कथन से यह स्पष्ट तौर पर सीखा जा सकता है कि महानता अपनी बात पर अड़े रहने में नहीं, बल्कि सत्य के सामने स्वयं को बदलने का साहस रखने में है।
दोस्तों, जीवन हमें बार-बार ख़ुद से यह पूछने का अवसर देता है कि हम किसी मूल्य की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं या फिर सिर्फ़ अपने पुराने निर्णय को बचाये रखने के लिए अड़े हैं? इसी तरह मेरी प्रतिबद्धता केवल न्याय के लिए है, या मैं सिर्फ़ अपनी छवि बचाने के लिए अड़ा हूँ? याद रखिएगा दोस्तों, वचन चरित्र की पहचान है, लेकिन विवेक चरित्र की परिपक्वता है। सच्चा धर्म केवल प्रतिज्ञा निभाने में नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में न्याय, करुणा और सत्य का साथ देने में है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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