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अब मेरे पास पर्याप्त है…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
7 hours ago
3 min read

Sep 20, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस आधुनिक युग में लगभग हर इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी पैसे कमाने में लगा रहता है। पहले उसका लक्ष्य सिर्फ़ घर अच्छे से चलाना होता है। लेकिन जैसे ही वो उसके क़ाबिल हो जाता है, तो वह ‘थोड़ा और…’ के फेर में पड़ बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने, फिर बड़ी गाड़ी और बड़ा घर बनाने, या फिर बैंक बैलेंस और बढ़ाने में लग जाता है। यानी कुल मिलाकर कहूँ तो सुविधाएं बढ़ाने में लग जाता है। इस पूरे चक्र में अगर कोई चीज़ नहीं बदलती है, तो वो है ‘थोड़ा और कमाने…’ की भूख। मेरी नज़र में यही आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज हमारे पास पैसा तो पहले से कहीं अधिक है, लेकिन संतुष्टि उससे कहीं कम। इसी बात को समझाते हुए आर्टरो लोमेली ने कहा था, “दुनिया में सफल वो नहीं है, जिसके पास ढेर सारा पैसा है। बल्कि सही मायने में सफल तो वो है, जिसे यह पता है कि ‘पर्याप्त’ कितना है। याद रखिएगा, धन की समस्या अक्सर धन की कमी की वजह से नहीं होती; बल्कि यह अक्सर असीमित धन कमाने की इच्छा से होती है। आज ₹1 लाख कमाने वाला ₹2 लाख के पीछे भाग रहा है, तो ₹10 लाख कमाने वाला भी ₹20 लाख के पीछे और ₹1 करोड़ वाला ₹10 करोड़ की चिंता में जी सकता है। यानी सिर्फ़ संख्या बदलती रहती है, लेकिन इंसान के भीतर बेचैनी वही रहती है। कुल मिलाकर कहूँ तो “थोड़ा और…” का कोई अंतिम अंक होता ही नहीं है।


दोस्तों, कुछ लोग बहुत कम साधनों में भी संतुष्ट दिखाई देते हैं और कुछ लोग अपार संपत्ति के बीच भी असुरक्षित रहते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है - “क्या महत्वाकांक्षा गलत है?” तो मेरा जवाब है, “बिल्कुल भी नहीं।” बड़ा सोचिए। खूब कमाइए। अपने परिवार को बेहतरीन जीवन दीजिए। अपने सपनों को पूरा कीजिए। अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कीजिए। लेकिन एक सीमा के बाद खुद से यह जरूर पूछिये, “मैं जो पा रहा हूँ, वह मेरी जिंदगी को बेहतर बना रहा है या केवल मेरी इच्छाओं का आकार बढ़ा रहा है?” जीवन में एक समय ऐसा आता है जब अतिरिक्त पैसा सुविधा नहीं, ज़िम्मेदारी बढ़ाता है। बड़ा घर यानी अधिक रखरखाव। महंगी चीज़ें यानी उनकी सुरक्षा की चिंता। अधिक संपत्ति यानी अधिक प्रबंधन। अधिक कमाई यानी अक्सर अधिक काम और इस अधिक की क़ीमत हम दुनिया की सबसे कीमती चीज, ‘अपने समय’ से चुकाते हैं। कई लोग धन कमाने के लिए अपना समय बेचते-बेचते उस उम्र तक पहुँच जाते हैं, जब उनके पास धन तो बहुत होता है, लेकिन उसे जीने का समय कम। जिस बच्चे के भविष्य के लिए आपने दिन-रात काम किया, वह बड़ा होकर अपने जीवन में व्यस्त हो गया। जिस परिवार को सुरक्षित रखने के लिए आपने सब कुछ किया, उसके साथ बैठने का समय ही नहीं बचा। जिस जीवन को बेहतर बनाने के लिए आपने दौड़ लगाई, वही जीवन रास्ते में कहीं पीछे छूट गया।


दोस्तों, अमीरी का अर्थ यह नहीं है कि आपके पास कितना जमा है। असली अमीरी तो वह होती है जब आप अपने जीवन को बेचकर और पाने की मजबूरी से आगे बढ़ “पर्याप्त” पा लेते हैं। यहाँ “पर्याप्त” का अर्थ रुक जाना नहीं है। पर्याप्त का अर्थ है, अपनी दौड़ का उद्देश्य समझ लेना। अगर आप भी अपने ‘पर्याप्त’ को जानना चाहते हैं तो ख़ुद से ये प्रश्न पूछिए। पहला, आपको कितना चाहिए ताकि सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें? दूसरा, आपको परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कितना चाहिए? तीसरा, अपने सपने पूरा करने के लिए आपको कितना चाहिए? और चौथा व अंतिम, क्या अब आपको थोड़ा समय स्वयं के लिए भी चाहिए? जिस दिन इन प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, उसी दिन धन आपका मालिक नहीं रहता; वह आपका साधन बन जाता है। तब आप दूसरों को देखकर अपनी कीमत तय नहीं करते। आप यह नहीं सोचते कि उसके पास क्या है। आप तो यह सोचते हैं कि “मेरे पास जो है, क्या मैं उसका सही उपयोग कर रहा हूँ?” और शायद यहीं से समृद्धि की असली शुरुआत होती है।


याद रखिएगा, जिस व्यक्ति को “और” चाहिए, उसके लिए दुनिया की कोई संपत्ति पर्याप्त नहीं; और जिसे “पर्याप्त” का अर्थ समझ आ गया, वह कम में भी समृद्ध हो सकता है। सफलता का अंतिम प्रमाण आपका बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि यह है कि आपकी महत्वाकांक्षा आपको कितना आगे ले गई और आपकी संतुष्टि आपको कितना भीतर तक भर पाई। कमाना जीवन का हिस्सा है, लेकिन यदि कमाते-कमाते जीवन ही खो दिया, तो सबसे बड़ी कीमत आपने चुका दी। इसलिए खूब कमाइए, लेकिन इतना अवश्य जानिए कि कब कहना है: “अब मेरे पास पर्याप्त है… और अब मुझे इसे जीना है।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


 
 
 

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