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दूसरों का हिसाब छोड़िए, अपना खाता देखिए !!!

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
4 hours ago
3 min read

Sep 17, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, बात अगर दूसरों के कर्मों का हिसाब किताब करने की हो, तो इसे हम निश्चित तौर पर बहुत ईमानदारी से कर सकते हैं। याने किसने हमें धोखा दिया, हमारा अपमान किया, हक छीना, आदि सब हमें ना सिर्फ़ याद रहता है, बल्कि हम बड़ी ईमानदारी के साथ उसे तुरंत सही-ग़लत भी ठहरा देते हैं। लेकिन अगर बात ख़ुद के कर्मों की हो तो हमें अक्सर इस बात का ध्यान ही नहीं रहता कि हमने दूसरों के साथ क्या किया? चलिए, एक कहानी से इसे समझने का प्रयास करते हैं-


एक शांत स्वभाव वाले संत अपने चंचल स्वभाव वाले शिष्य, जिसे दूसरों के मामलों में बोलने का बहुत शौक था, के साथ भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक मछुआरे को तालाब में जाल डालते देखा। शिष्य ने उसे टोकते हुए, अहिंसा का उपदेश देना शुरू कर दिया। जिसपर मछुआरे ने अपना पक्ष रखा। लेकिन शिष्य के ना समझने के कारण बात बढ़ते-बढ़ते पहले बहस और फिर झगड़े तक पहुँच गई। जिसे आगे निकल चुके संत ने सुना, तो वे तुरंत लौट कर आए और शिष्य को अपने साथ ले गए। इससे व्यथित हो शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, जो गलत कर रहा है उसे दंड कौन देगा?” संत ने शांत स्वर में कहा, “हमारा काम समझाना है, दंड देना नहीं। ईश्वर की व्यवस्था में हर कर्म का हिसाब है। तुम चिंता मत करो और अपने रास्ते चलो।”


दो वर्ष बाद संत और शिष्य का उसी तालाब के पास से गुजरना हुआ। वहाँ उन्होंने एक साँप को देखा, जिसे असंख्य चींटियाँ नोच-नोचकर खा रही थीं। शिष्य का हृदय दया से भर गया। वह साँप को बचाने के लिए आगे बढ़ा, तभी संत ने उसे रोकते हुए कहा, “बचाओ मत, इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो।” गुरु की बात सुन शिष्य स्तब्ध था। वह कुछ कहता उसके पहले ही संत बोले, “सर्प रूपी ये वही मछुआरा है, जिसे तुमने दो वर्ष पहले मछली न मारने का उपदेश दिया था। जिन मछलियों को यह पकड़ता और मारता था, आज वे ही चींटी के रूप में कर्मों का हिसाब कर रही है। याने वही कर्म आज किसी और रूप में इसके सामने खड़े हैं।” गुरु की बात सुन शिष्य आश्चर्यचकित था।


दोस्तों, ऐसा ही कुछ हम सभी के जीवन में भी होता है। अक्सर हम सोचते हैं कि भगवान हमारे साथ न्याय क्यों नहीं कर रहे? जिसने हमारे साथ गलत किया, वह सुखी क्यों है? जिसने हमें धोखा दिया, उसे सजा क्यों नहीं मिली? मेरी नजर में ये सब हमें सोचना ही नहीं चाहिए क्योंकि ईश्वर के खाते का हिसाब रखना हमारा काम नहीं है। हमें तो बस अपने खाते का हिसाब रखना चाहिए क्योंकि हम भी हर दिन उसमें कुछ न कुछ या तो जमा कर रहे हैं या निकाल रहे हैं। कुछ अच्छा किया तो जमा और कुछ ग़लत किया तो निकासी। जैसे एक अच्छा शब्द या किसी की मदद या किसी को माफ करना या फिर ईमानदार रहना तो जमा और किसी को दुख या धोखा दिया अथवा किसी से घृणा की, अहंकार किया तो निकासी। याद रखियेगा, ये खाता कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर बन रहा है।


दोस्तों, कर्म का अर्थ केवल बड़े-बड़े काम नहीं हैं। हमारी नीयत, हमारी भाषा भी कर्म है। किसी के बारे में हमारी सोच भी हमारे चरित्र का हिस्सा है और किसी कमजोर व्यक्ति के साथ हमारा व्यवहार भी हमारे व्यक्तित्व का आईना है। इसलिए अगली बार जब किसी दूसरे के कर्मों का फैसला करने का मन करे, तो एक पल रुक कर, अपने भीतर झाँक लीजिएगा। शायद वहाँ भी कुछ सुधार की आवश्यकता दिखाई दे।


दोस्तों, दूसरों की गलतियाँ गिनने के लिए ये जिंदगी बहुत छोटी है। अपना समय अपने कर्मों को बेहतर बनाने में लगाइए ताकि जब जीवन आपके खाते का हिसाब करे, तो पछतावे से ज्यादा संतोष दिखाई दे। वैसे भी दूसरों का आपसे किया व्यवहार आपके नियंत्रण में नहीं है। लेकिन आपने उसके जवाब में क्या किया, ये हमेशा आपके हाथ में है। इसलिए दूसरों का हिसाब ईश्वर पर छोड़ दीजिए और अपने कर्मों पर ध्यान दीजिए। याद रखिएगा, दुनिया की अदालत से बचना संभव हो सकता है, लेकिन अपने कर्मों की अदालत से बचना संभव नहीं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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