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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
1 day ago
3 min read

Sep 13, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन में अक्सर हम लक्ष्यों या सपनों को विश्वास की कमी की बजाए कोशिश में कमी की वजह से नहीं पा पाते हैं। हम मंजिल तो पाना चाहते हैं, लेकिन रास्ते की कठिनाइयों से डर जाते हैं। हम सफलता पाने का सपना तो देखते हैं, लेकिन असफलता की आशंका हमें पहला कदम उठाने से रोक देती है। मेरी आज की कहानी इसी फ़र्क को बड़ी सरलता के साथ समझाती है-


कई साल पहले एक छोटे से गाँव में एक वृद्ध साधु रहते थे। वे अपने नियम के अनुसार प्रतिदिन संध्या को गांव के मंदिर में कन्हैया के सामने दीपक लगाया करते थे। उसी गाँव में एक नास्तिक व्यक्ति भी रहता था। उसका भी एक अजीब नियम था, वो साधु के मंदिर से लौटते ही, मंदिर में जाकर उनके जलाए हुए दीपक को बुझा दिया करता था। साधु ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कभी माना नहीं।


इसी तरह दिन, महीने और फिर साल गुजरते गए, लेकिन दोनों के नियम नहीं बदले। एक दिन अचानक ही गाँव में मौसम बिगड़ने के कारण आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ आँधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। जिससे गाँव के रास्तों पर पानी भर गया। जिस वजह से साधु महाराज ईश्वर पर आस्था और विश्वास होने के बाद भी अपने नियमानुसार दिया लगाने के लिए मंदिर नहीं जा पाये। वे मन-ही-मन सोच रहे थे, “इतनी बारिश में मंदिर जाकर दीपक लगाने से भी क्या होगा? वो नास्तिक रोज़ की ही तरह उसे बुझा देगा। आज रहने देता हूँ, कल भगवान से क्षमा माँग लूँगा।”


इसके विपरीत नास्तिक इस विश्वास के साथ मंदिर पहुँच गया की ‘साधु तो हर परिस्थिति में मंदिर आएगा ही।’ वहाँ वो बारिश में भीगते हुए, साधु का इंतजार करता रहा, लेकिन साधु नहीं आए। यह देख उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था। अंत में उसने निर्णय लिया कि “मैं आज भी दीपक बुझाए बिना नहीं जाऊँगा। फिर भले ही मुझे ही दीपक क्यों ना जलाना पड़े।” विचार आते ही उसने मंदिर में रखा दीपक उठाया, साफ़ किया, फिर उसमें बत्ती लगा कर घी डाला और जला दिया। और तभी… कृष्ण कन्हैया उसके सामने प्रकट हो गए और बोले, “आज तुम मुझे पाने के अधिकारी बने हो। साधु मुझ पर विश्वास करता था, लेकिन आज वह परिस्थितियों से हार गया। तुम मुझे मानते तक नहीं थे, फिर भी अपने संकल्प से नहीं हटे। इतनी बारिश में भी तुम यहाँ आए। इसलिए आज मुझे तुम्हारे पास आना ही था।”


मित्रों, कहानी का सबसे बड़ा प्रश्न यही है की “भगवान किसके करीब थे—साधु के या नास्तिक के?” थोड़ा गंभीरता के साथ सोच कर उत्तर दीजिएगा क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर शायद हमारे जीवन को भी बदल सकता है। हममें से कितने ही लोग ऐसे हैं जो सपने तो बड़े देखते हैं, लेकिन पहला तूफ़ान आते ही रुक जाते हैं और ख़ुद को दिलासा देते हुए कहते हैं - “अभी समय ठीक नहीं है।” “परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं।” “अभी थोड़ा और इंतजार करता हूँ।” “बाद में कोशिश करूँगा।”और फिर कई बार हमारा वह “बाद में” कभी आता ही नहीं। कबीर जी ने शायद इसी सत्य को बहुत पहले पहचान कर कहा था, “जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ॥” याने मोती किनारे पर बैठकर नहीं मिलते। उसके लिए गहराई में उतरना पड़ता है। वहाँ डर होता है, जोख़िम होता है और असफलता की संभावना भी होती है। लेकिन मोती भी वहीं मिलते हैं।


हमारी जिंदगी में भी सफलता, संतोष, प्रेम और उपलब्धियाँ ऐसे ही मोती हैं। जिन्हें पाने के लिए हमें गहराई की चिंता किए बगैर पानी में उतरना पड़ता है। दोस्तों, जिन सपनों को किसी भी डर के कारण टाल रहे हैं, उन्हें पहचानिए और पाने के लिए इसी क्षण चल पड़िए। हो सकता है मंजिल अभी बहुत दूर हो; रास्ता कठिन हो और लोग आपका मजाक उड़ा रहे हों। इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि जिंदगी में सबसे बड़ा नुकसान असफल होना नहीं बल्कि बिना प्रयास किए यह सोचते रह जाना है कि “अगर मैंने कोशिश की होती, तो शायद मैं उस पार पहुँच गया होता।” याद रखिएगा, चमत्कार उस क्षण शुरू होता है, जब हम डर के बावजूद आगे बढ़ते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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