जो अपना है ही नहीं उसके खोने का क्या डर…

Sep 12, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, महान विचारक मार्कस ऑरेलियस का कहना था कि “जब दुनिया की कोई भी चीज़ वास्तव में आपकी नहीं है, तो फिर उसे खोने से आप डरते क्यों हैं?” पहली बार में हमे यह विचार थोड़ा विचित्र और कठोर लग सकता है। क्योंकि हम अपने घर, परिवार, पद, संपत्ति, रिश्तों और उपलब्धियों को अपना ही तो मानते हैं। लेकिन थोड़ा ठहराव और गम्भीरता के साथ सोचिए, क्या वास्तव में इनमें से किसी चीज़ पर हमारा पूरा नियंत्रण है? मेरी नजर में तो नहीं क्योंकि हम किसी रिश्ते को अपना कह तो सकते हैं, लेकिन दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते। इसी तरह हम धन तो कमा सकते हैं, लेकिन उसके बने रहने की गारंटी नहीं दे सकते। हम शरीर का ध्यान रख सकते हैं, लेकिन समय को रोक नहीं सकते। हम पद हासिल कर सकते हैं, लेकिन हमेशा उस पद पर बने रहने का अधिकार हमारे पास नहीं होता।
दोस्तों, समस्या चीज़ों के होने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब हम उनके होने को अपनी शांति की शर्त बना देते हैं। यहीं से भीतर का शोर पैदा होता है। जैसे, “अगर यह चला गया तो?”, “अगर लोग मेरे बारे में गलत सोचने लगे तो?”, “अगर मेरी सफलता खत्म हो गई तो?”, “अगर यह रिश्ता टूट गया तो?”, आदि। हमारा मन लगातार भविष्य की काल्पनिक हानियों से लड़ता रहता है। बाहर कुछ हुआ भी नहीं होता, लेकिन भीतर हम उसकी दस बार सजा भुगत चुके होते हैं।
दोस्तों, इसलिए जीवन में एक ऐसी शक्ति विकसित करना जरूरी है, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं—आंतरिक मौन। आंतरिक मौन का अर्थ यह नहीं कि आप दुनिया से दूर हो जाएँ। इसका अर्थ है कि दुनिया में शोर कितना भी हो, आप अपने भीतर का नियंत्रण किसी और के हाथ में न दें। अगर कोई आपकी आलोचना करे, तो तुरंत प्रतिक्रिया न दें। कोई आपको उकसाए, तो अपना संतुलन न खोएँ। कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या करे, तो अपना रास्ता न बदलें। कोई आपके बारे में गलत धारणा बनाए, तो अपनी पहचान उसके विचारों के हवाले न करें। यही आंतरिक स्वतंत्रता है।
दोस्तों, जब भीतर शांति होती है, तो नकारात्मकता दरवाज़े तक आ सकती है, लेकिन उसे भीतर प्रवेश करने की अनुमति देना है या नहीं—यह निर्णय आपका रहता है। उदाहरण के लिए किसी भी नदी को देखिए। उसके ऊपर पत्ते गिरते हैं, कंकड़ गिरते हैं, जिससे पानी में हलचल होती है। लेकिन नदी अपनी दिशा नहीं छोड़ती। वह हर चीज़ को अपने साथ लेकर आगे बढ़ जाती है। हमें भी जीवन में ऐसा ही होना सीखना है।
दोस्तों, हर बात का जवाब देना आवश्यक नहीं; हर बहस जीतना आवश्यक नहीं; हर आलोचना का स्पष्टीकरण देना आवश्यक नहीं; हर व्यक्ति को अपनी बात समझाना भी आवश्यक नहीं। कभी-कभी सबसे शक्तिशाली उत्तर मौन होता है। क्योंकि जब आपका मन शांत होता है, तब आप परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया नहीं करते—आप उनका उत्तर चुनते हैं और शायद यही उस विचार की गहराई है। जब हमें समझ आने लगता है कि दुनिया की चीज़ें हमारे पास हमेशा के लिए नहीं, कुछ समय के लिए हैं, तब पकड़ थोड़ी ढीली होती है और जीवन थोड़ा हल्का हो जाता है।
दोस्तों, हम चीज़ों का आनंद लेते हैं, लेकिन उनसे अपनी पहचान नहीं बाँधते। हम लोगों से प्रेम करते हैं, लेकिन उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करते। हम सफलता का स्वागत करते हैं, लेकिन उसके खोने के डर में जीना बंद कर देते हैं। याद रखिएगा, जिसे आप नियंत्रित नहीं कर सकते, उसे लेकर लगातार चिंतित रहना आपकी ऊर्जा को नष्ट करता है। अपने भीतर इतना मौन पैदा कीजिए कि बाहर का शोर आपकी दिशा तय न कर सके। चीज़ें आएँगी और जाएँगी, लोग मिलेंगे और बिछड़ेंगे, परिस्थितियाँ बदलेंगी, लेकिन यदि आपका भीतर स्थिर है, तो जीवन का कोई तूफान आपको भीतर से आसानी से नहीं तोड़ सकता।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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