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समय तय करता है कि कौन ग़लत था…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
15 minutes ago
3 min read

Sep 10, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

Image Courtesy: The Grapes of Wrath by John Steinbeck — cover image courtesy of the respective copyright owner.
Image Courtesy: The Grapes of Wrath by John Steinbeck — cover image courtesy of the respective copyright owner.

दोस्तों, घटना वर्ष 1939 की है, कैलिफोर्निया के सेलिनास में कुछ लोग जॉन स्टाइनबेक की लिखी किताब “द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ” की प्रतियां लेकर आए; पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जलाने के लिए। वह भी उनके जन्मस्थान पर ही। जानते हैं क्यों? क्योंकि इस किताब में स्टाइनबेक ने उन गरीब प्रवासी मजदूरों की पीड़ा लिख दी थी, जिनकी तकलीफें समाज का शक्तिशाली वर्ग देखना नहीं चाहता था। हालाँकि इस घटना से स्टाइनबेक को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। उन्होंने तो वही किया, जो एक सच्चा इंसान या लेखक करता। याने उन्होंने वह देखा, जिसे लोग छिपाना चाहते थे; और वह लिखा, जिसे लोग सुनना नहीं चाहते थे।


असल में 1930 के दशक में अमेरिका के डस्ट बाउल क्षेत्र से हजारों परिवार बेहतर जीवन की उम्मीद में कैलिफोर्निया पहुँचे। उन्हें लगता था कि वहाँ उन्हें खेतों में काम मिलेगा और परिवार भूखे मरने से बच सकेगा। लेकिन उन्हें वहाँ कठिन परिस्थितियों के बीच, बेहद कम मजदूरी में काम करना पड़ा। कुल मिलाकर वहाँ उनका शोषण किया गया। स्टाइनबेक इन लोगों के बीच गए। उनके शिविर देखे, उनकी परेशानियाँ सुनीं और उनके जीवन को करीब से समझा। याने उन्होंने दूर बैठकर, अंदाज़े से लिखने के स्थान पर पहले स्थिति को समझा और फिर ‘जोड परिवार’ नाम के काल्पनिक परिवार के माध्यम से मजदूरों की वास्तविक पीड़ा को शब्द दिए। यहीं से उनके जीवन का असली संघर्ष शुरू हुआ। उनकी इस किताब ने केवल पाठकों को ही प्रभावित नहीं किया; बल्कि सत्ता, धन और प्रभाव रखने वालों को असहज कर दिया। कृषि समूहों ने इसे झूठ और प्रचार कहा। कई जगह इसे प्रतिबंधित कर, जलाया गया। स्टाइनबेक को धमकियाँ मिली। लेकिन इस सब के बाद भी उन्होंने अपनी कलम नहीं रोकी और शायद यहीं से इस कहानी का सबसे बड़ा सबक निकलता है।


दोस्तों, जीवन में हम अक्सर यह सोचकर चुप बैठ जाते हैं कि ‘लोग क्या कहेंगे…’, ‘कहीं कोई नाराज़ तो नहीं हो जाएगा…’, ‘कहीं इसका विरोध तो नहीं होगा…’, ‘कहीं ये हमारी प्रतिष्ठा को तो प्रभावित नहीं करेगा…’ आदि। लेकिन अगर हर व्यक्ति केवल सामाजिक स्वीकृति की प्रतीक्षा करता रहेगा, तो बदलाव तो कभी शुरू ही नहीं हो पाएगा।


दोस्तों, सही बात कहना और लोकप्रिय बात कहना, दो अलग चीजें हैं। सही काम करने के लिए हमेशा तालियाँ नहीं मिलती, कई बार विरोध भी मिलता है। कई बार अपने ही लोग प्रश्न उठाते हैं। कई बार आपकी नीयत पर संदेह किया जाता है। लेकिन विरोध हमेशा इस बात का प्रमाण नहीं कि आप गलत हैं। कभी-कभी वह इस बात का संकेत भी होता है कि आपने किसी ऐसी सच्चाई को छू दिया है, जिसे लोग सुविधानुसार अनदेखा कर रहे थे।


बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, समय ने स्टाइनबेक के साथ एक दिलचस्प न्याय किया और जिस किताब को कभी जलाया गया था, वही आगे चलकर अमेरिकी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हुई और वर्ष 1940 में “द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ” को पुलित्जर पुरस्कार मिला और 1962 में स्टाइनबेक को साहित्य का नोबल प्राइज़ मिला। वैसे स्टाइनबेक की सबसे बड़ी जीत ये पुरस्कार नहीं थे, बल्कि जिन लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा था उसे लाखों लोगों तक पहुंचा पाना था।


दोस्तों, ये बात किसी के भी सार्थक जीवन की कसौटी हो सकती है। आपने कितना कमाया, कितनी प्रसिद्धि पाई और कितने लोग आपकी प्रशंसा करते हैं—ये सब महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आपके होने से किसी अन्य व्यक्ति को अपनी आवाज़ मिलती है या नहीं? आपके साहस से कोई अन्य व्यक्ति थोड़ा मजबूत होता है या नहीं? आपने कभी सुविधा के बजाय सत्य को चुना है या नहीं?


दोस्तों, आसान रास्ता अक्सर भीड़ के साथ चलता है। लेकिन परिवर्तन लाने के लिए कई बार अकेले चलना पड़ता है। इसलिए ही सच बोलने वाले को हर समय तालियाँ नहीं मिलती। कभी-कभी उसकी नीयत पर सवाल उठते हैं और उसे अकेला छोड़ दिया जाता है। कई बार उद्देश्य सही, नीयत साफ और सत्य के प्रति ईमानदार रहने के बाद भी विरोध सहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में घबराइए मत क्योंकि समय अक्सर तय करता है कि कौन गलत था, वह व्यक्ति जो सच बोल रहा था, या वह भीड़ जो सच सुनना नहीं चाहती थी।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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