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बच्चों से रोज़ कहें ये 10 बातें…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 22 minutes ago
  • 3 min read

Sep 8, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, बच्चों की परवरिश याने पैरेंटिंग केवल उन्हें सही और गलत सिखाने का नाम नहीं है। यह उनके भीतर ऐसी शक्ति विकसित करने की प्रक्रिया है, जो जीवन के कठिन क्षणों में भी उन्हें सम्भाल सके; उन्हें सही रास्ता दिखा सके। सिखाने की इस प्रक्रिया में माता-पिता के कहे शब्द महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि जो शब्द वे बार-बार अपने बच्चों को कहते हैं, वही शब्द उनकी आंतरिक आवाज़ बन जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि हमारे शब्द केवल निर्देश देने वाले न हों, बल्कि उनमें भरोसा, स्वीकार्यता और आत्मविश्वास भी हो। अगर आप मेरी बातों से सहमत हों तो आज ही से निम्न 10 बातें बार-बार अपने बच्चों से कहना शुरू कर दीजिए, जिससे उनके भीतर भरोसा, स्वीकार्यता और आत्मविश्वास का भाव पैदा किया जा सके-


1. “हर चीज़ तुरंत समझ आ जाए, यह जरूरी नहीं है।”

हर बच्चा अपनी गति से समझता और विकसित होता है। इसलिए सीखने में असफल रहने या धीमी गति से सीखने पर बच्चे को उपरोक्त बात कहें। ऐसा करना उन्हें सीखने के लिए सुरक्षित वातावरण देता है।


2. “तुम्हें मुझसे हर बात छिपाने की जरूरत नहीं है।”

जब बच्चा जानता है कि सच बताने पर उसे तुरंत डांट नहीं मिलेगी, तो वह कठिन परिस्थितियों में भी माता-पिता से बात करने का साहस करता है। याद रखें, विश्वास संवाद से बनता है, डर से नहीं।


3. “तुम्हारी राय मुझसे अलग हो सकती है।”

बच्चे को असहमति व्यक्त करने की अनुमति देना उसके व्यक्तित्व का सम्मान है। हर बात में माता-पिता से सहमत होना अच्छी परवरिश का प्रमाण नहीं; अपनी बात सम्मानपूर्वक रखना भी एक जरूरी जीवन-कौशल है।


4. “तुम्हें हर किसी को खुश करने की जरूरत नहीं है।”

बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि दूसरों की स्वीकृति ही उनकी कीमत तय नहीं करती। उन्हें अपने निर्णयों, मूल्यों और विवेक पर भरोसा करना सीखना चाहिए।


5. “तुम्हें मदद मांगने में कभी शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए।”

मदद मांगना असमर्थता नहीं, बल्कि समझदारी है। जो बच्चा अपनी जरूरत पहचानकर सहायता मांगना सीखता है, वह जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास से करता है।


6. “तुम्हारी उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन तुम उनसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो।”

बच्चे को केवल उसके अंकों, पुरस्कारों या प्रदर्शन से पहचानना उसके मन में शर्तों वाला आत्म-मूल्य पैदा कर सकता है। उसे यह महसूस होना चाहिए कि उसका महत्व परिणामों से बड़ा है।


7. “चलो पहले समझते हैं कि तुम्हें ऐसा क्यों महसूस हो रहा है।”

बच्चे के व्यवहार को तुरंत “जिद” या “बदतमीजी” का नाम देने के बजाय उसकी भावना को समझने की कोशिश करें। कई बार व्यवहार के पीछे कोई ऐसी जरूरत होती है जिसे बच्चा शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता।


8. “तुम्हें अपने फैसलों के परिणाम समझने का मौका मिलेगा।”

हर गलती से बच्चे को बचाना जरूरी नहीं। उम्र के अनुसार छोटे निर्णय लेने और उनके परिणाम देखने देना उसे जिम्मेदारी, विवेक और स्वतंत्र सोच सिखाता है।


9. “मैं तुम्हारी तुलना किसी और से नहीं करूंगा।”

तुलना अक्सर प्रेरणा से ज्यादा असुरक्षा पैदा करती है। बच्चे को कल के अपने रूप से बेहतर बनने के लिए प्रेरित करें, किसी दूसरे बच्चे की नकल करने के लिए नहीं।


10. “जब तुम बड़े हो जाओगे, तब भी तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण रहोगे।”

बच्चे को यह भरोसा चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ माता-पिता का प्रेम कम नहीं होगा। यही भावनात्मक सुरक्षा उसे दुनिया में स्वतंत्र होकर आगे बढ़ने की ताकत देती है।


अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तों कि, ‘बच्चों को क्या सिखाना है’ सोचने जितना ही महत्वपूर्ण यह तय कर लेना है कि आप उन्हें क्या और कैसा महसूस कराना चाहते है। याद रखियेगा, एक ना एक दिन बच्चे हमारी बातों को तो भूल जाएँगे, लेकिन वे इतना ज़रूर याद रखेंगे कि हमारे साथ रहते हुए उन्हें कैसा महसूस होता था। इसलिए दोस्तों, अगली बार जब बच्चा आपके सामने कोई परेशानी लेकर आए, तो समाधान देने से पहले उसे यह एहसास जरूर दीजिएगा कि, “मैं तुम्हें सुनने के लिए ही यहां हूँ, तुम्हें बदलने के लिए नहीं।” ऐसा करना बच्चों के भीतर कठिन परिस्थितियों में भी अपने रास्ते खोजने का विश्वास पैदा करता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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