top of page
Search

दुनिया को दिखाने में ख़ुद को ना खो देना…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
11 minutes ago
3 min read

Sep 17, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है


दोस्तों, सोच कर देखियेगा अक्सर ज्यादातर लोग जीवन भर मेहनत करने के बाद भी भीतर से खाली क्यों रह जाते है? उनके पास पद, पैसा, पहचान और अचीवमेंट्स की लंबी सूची हो सकती है, लेकिन उसके बाद भी रात को अकेले में वे इस बात से परेशान रहते हैं कि “क्या वे सच मैं वो हासिल कर पाए है जिसकी उन्हें तलाश थी?”


गंभीरता पूर्वक इसे समझा जाये तो शायद समस्या उनकी मेहनत में नहीं, बल्कि उस लक्ष्य में थी, जिसके लिए मेहनत की गई थी। हम सब बचपन से ही सुनते आए हैं—लक्ष्य बनाइए, मेहनत कीजिए और सफल हो जाइए। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात इस पाठ में अक्सर छूट जाती है कि हर लक्ष्य हासिल करने लायक नहीं होता। कुछ लक्ष्य हमें ऊँचाई तक ले जाते हैं, लेकिन भीतर से गिरा देते हैं। कुछ उपलब्धियाँ दुनिया की नजर में बड़ी होती हैं, लेकिन हमारी आत्मा के सामने बहुत छोटी। याने अगर किसी पद को पाने के लिए हमें अपने सिद्धांत छोड़ने पड़ें, किसी व्यवसाय में सफलता के लिए ईमानदारी से समझौता करना पड़े, या अधिक पैसा कमाने के लिए रिश्तों, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को लगातार कुर्बान करना पड़े, तब एक बार रुककर यह जरूर पूछना चाहिए, “क्या यह सफलता वास्तव में सफलता है?”


यह बात सही है कि मंजिल तक पहुँचना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है यह देखना कि वहाँ पहुँचते-पहुँचते हम खुद को कितना खो चुके हैं। सार्थक लक्ष्य वही है, जिसे हासिल करने के बाद केवल दुनिया हमें बधाई न दे, बल्कि हमारा अपना मन भी हमें धन्यवाद दे। अब आप सोच रहे होंगे कि सार्थक लक्ष्य को पहचानेंगे कैसे? तो जवाब बहुत सरल है, ऐसा लक्ष्य जो हमारे मूल्यों से जुड़ा हो। जिसे पाने के लिए मेहनत करते वक्त हमें अपने आप से शर्मिंदा न होना पड़े। याने ऐसा लक्ष्य जिसकी कीमत हमारी अंतरात्मा से न चुकानी पड़े, वो सार्थक लक्ष्य है।


एक बात और; लक्ष्य जितना महत्वपूर्ण होता है, उसे पाने का रास्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है। ईमानदारी केवल जीवन की एक अच्छी आदत नहीं है। यह हर बड़ी उपलब्धि की नींव होनी चाहिए क्योंकि बेईमानी से मिली सफलता आपको दुनिया की नजर में विजेता बना सकती है, लेकिन भीतर से पराजित। आप जीवन में बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं, लेकिन उसके बाद भी खुश नहीं हो सकते। आप जीवन में भौतिक ऊंचाइयों के शिखर छू सकते हैं, लेकिन फिर भी आप अंदर से महसूस कर सकते हैं कि आप गलत दिशा में चल रहे थे। सब कुछ होने के बाद भी आपका मन पूछ सकता है, “इस सबके लिए देख तूने क्या-क्या खो दिया…”


इसलिए अगली बार जब आप अपने लिए कोई बड़ा लक्ष्य तय करें, तो केवल यह मत पूछिए, “मैं इसे कैसे हासिल करूँ? पहले पूछिए, “मुझे इसे हासिल क्यों करना है?” फिर पूछिए, “क्या यह लक्ष्य मेरे मूल्यों के अनुरूप है?” और अंत में पूछिए, “क्या इसे हासिल करने की कीमत मैं खुशी-खुशी चुका सकता हूँ?” यदि इन सवालों के जवाब आपके भीतर शांति पैदा करते हैं, तो पूरी ताकत से आगे बढ़िए क्योंकि जब लक्ष्य और मूल्य एक दिशा में चलते हैं, तो मेहनत बोझ नहीं रहती, वह आनंद बन जाती है। लेकिन जब लक्ष्य हमारे मूल्यों से टकराता है, तो उपलब्धि भी बेचैनी बन जाती है।


दोस्तों, जिंदगी में केवल सफल होने की कोशिश करने के स्थान पर ऐसी मंजिल पाने की कोशिश कीजिए, जिसके बाद आपको गर्व महसूस हो। याने सफलता आपको आनंद दे। इसलिए मंजिल चुनने में जल्दबाज़ी मत कीजिए क्योंकि गलत मंजिल तक पहुँचने में भी जिंदगी लग सकती है। इसलिए पहले तय कीजिए कि आपको कहाँ पहुँचना है। फिर तय कीजिए कि वहाँ पहुँचकर कैसे बने रहना है। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल अपना लक्ष्य हासिल करने में नहीं, बल्कि लक्ष्य हासिल करने के बाद यह कह पाने में है, “मैंने अपना लक्ष्य हासिल किया और उसे हासिल करते हुए खुद को खोया नहीं।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


 
 
 

Comments


bottom of page