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अनुशासन के बिना प्रगति संभव नहीं !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 day ago
  • 3 min read

Jan 14, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

बात कई सौ साल पुरानी है, रूप नगर में एक मठ था, जहाँ अनेक भिक्षु साधना और जीवन दर्शन सीखने के लिए रहते थे। उसी मठ में एक वरिष्ठ भिक्षु भी थे, जिन्हें कई सिद्धियाँ प्राप्त थीं। उनके ज्ञान, शक्ति और सिद्धियों के कारण लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे स्वयं भी जानते थे कि सम्मान कितनी बड़ी चीज़ होती है। लेकिन धीरे-धीरे इसी सम्मान पर उनकी निर्भरता बढ़ गई थी। एक दिन दोपहर के समय सभी भिक्षु ध्यान में बैठे थे। मठ का नियम था कि दोपहर के बाद भोजन नहीं किया जा सकता। यह जानने के बाद भी ध्यान के पश्चात कुछ युवा भिक्षुओं ने कहा कि वे बहुत भूखे हैं। वरिष्ठ भिक्षु ने उनसे पूछा, “क्या तुम सच में भूखे हो?” शिष्यों ने धीमे से कहा, “हाँ, पर नियम के अनुसार हम अब नहीं खा सकते।” वरिष्ठ भिक्षु मुस्कुराए और बोले, “चिंता मत करो, मेरे पास फल हैं, तुम खा लो।” उन्होंने अपने पास रखे फल शिष्य को दे दिए।


उसी मठ में एक और सिद्ध भिक्षु थे, जो नियमों का पालन अत्यंत कड़ाई से करते थे और अपनी सिद्धि का दिखावा भी नहीं करते थे। वे मठ के सिद्धांतों और अनुशासन का पालन करते हुए ही जीते थे। अगले दिन उन्होंने सबको एक जगह इकट्ठा किया और घोषणा की, “जिसने भी भूख के कारण मठ का नियम तोड़ा है, उसे इस मठ में रहने का अधिकार नहीं है। अनुशासन सभी के लिए समान है।" यह सुनकर सभी भिक्षु स्तब्ध रह गए। इतना सुनते ही वरिष्ठ भिक्षु ने बिना कुछ कहे अपना चोंगा उतारा और चुपचाप मठ छोड़ दिया। वे जानते थे कि उन्होंने नियम तोड़ा है, इसलिए उन्हें दंड मिलना चाहिए। अपनी सिद्धि, सम्मान और उम्र के बावजूद उन्होंने अनुशासन को सर्वोपरि रखा और बिना विरोध किए चले गए।


यह घटना हमें जीवन की इस सच्चाई से रूबरू कराती है की अनुशासन के बिना सच्ची प्रगति संभव नहीं। सिद्धि, सम्मान, शक्ति, ये सब तभी स्थायी रहते हैं जब उनका आधार अनुशासन हो। वरिष्ठ भिक्षु के पास शक्तियाँ थीं, सम्मान था, अनुभव था, लेकिन जब उन्होंने नियम तोड़ा, तो उन्होंने स्वयं ही उसके परिणाम को स्वीकार किया। यही सच्ची महानता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो महानता सिद्धियों में नहीं, बल्कि अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेने में है।


अब सवाल आता है कि अनुशासन शुरू कहाँ से होता है? तो मेरा जवाब है, ख़ुद से। लेकिन हम दूसरों को नियमों का पालन करने के लिए कहते हैं, लेकिन खुद उसे निभाने में पीछे रह जाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे अनुशासित रहें, पर हम स्वयं समय का पालन नहीं करते। हम चाहते हैं कि कर्मचारी नियम मानें, लेकिन हम खुद बहाने बना लेते हैं। हम चाहते हैं कि समाज सुधरे, पर हम स्वयं छोटी-छोटी आदतें नहीं बदलते।


दोस्तों, इस सच्चाई को हमेशा याद रखिएगा, जब तक हम खुद अनुशासित नहीं बनते, तब तक हमारे पास किसी और को अनुशासन सिखाने का अधिकार नहीं है और अनुशासन बाहर से नहीं, अंदर से शुरू होता है। इसलिए ही सफलता, शक्ति, सम्मान और प्रसिद्धि आदि का आधार अनुशासन माना जाता है। उपरोक्त किस्से में वह भिक्षु सिद्ध था, लेकिन वह सिद्धि भी तब तक मूल्यवान थी जब तक वह नियमों के दायरे में थी। याद रखिएगा दोस्तों, अपनी शक्ति का सही उपयोग वही कर सकता है जो स्वयं अनुशासित हो। अगर आप सच में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो अपने जीवन में कठोर अनुशासन अपनाइए और शुरुआत छोटी आदतों से कीजिए। जैसे, समय का पालन, ईमानदारी, जिम्मेदारी, और आत्म-नियंत्रण। याद रखिएगा दोस्तों, अनुशासन स्वयं पर विजय है और जो स्वयं पर विजय पा लेता है, दुनिया की कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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