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जीतना हो तो ख़ुद के ग़ुस्से को जीतें !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Mar 3
  • 3 min read

Mar 3, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अन्य भावों की तरह गुस्सा आना भी स्वाभाविक है, लेकिन गुस्से में निर्णय लेना विनाश का निमंत्रण है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि गुस्सा एक ऐसी छोटी सी चिंगारी है जिसे जरा सी हवा मिल जाए तो पूरा घर जला सकती है क्योंकि रिश्ते बहुत नाजुक होते हैं। उन्हें टूटने में एक पल लगता है और जुड़ने में साल लग जाते हैं। इसलिए आपको जब भी गुस्सा आए, उसी क्षण खुद से कहिए, “रुको!” क्योंकि गुस्से का असली समाधान सामने वाले को हराना नहीं, खुद को सम्भालना है। याद रखिएगा, गुस्से में कहा गया एक शब्द भी रिश्तों को हमेशा के लिए बदल सकता है। आपने अपने जीवन में ही कई बार कुछ कहने के बाद पछतावा करते हुए सोचा होगा कि “काश, मैं उस समय चुप रहता।” यह बात अपने आप में ही याद दिलाती है कि एक क्षण का संयम कई सालों की दोस्ती, रिश्तेदारी या सम्मान बचा सकता है।


दोस्तों, शांत रहना कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत है। चुप रहना अपनी भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें समझने का अवसर देना है। जब आप कुछ देर के लिए मौन हो जाते हैं, तो मन धीरे-धीरे साफ होने लगता है। गुस्से की धुंध हटते ही हमें क्या सही है, क्या गलत याने सच दिखाई देने लगता है। इसलिए शांत होने के बाद माफ़ी माँगते हुए “मैंने गुस्से में कह दिया था।” कहने के स्थान पर समझदारी इसी में है कि ग़ुस्से के दौरान चुप रहकर उस पल को गुजर जाने दिया जाए।


उदाहरण के लिए आप अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को ही ले लीजिए। उन्हें जब भी किसी पर अत्यधिक गुस्सा आता था तो वे तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते थे। वे सामने वाले को एक गुस्से भरा पत्र लिखते थे। लेकिन अक्सर उन्हें सारा क्रोध उँडेले पत्र को सामने वाले व्यक्ति को भेजना ही नहीं पड़ता था। याने भेजने के पूर्व ही उनका गुस्सा शांत हो जाता था और वे उस पत्र को फाड़ कर फेंक देते थे। बिना किसी को आहत किए गुस्से को बाहर निकालने का यह उनका तरीका था। उन्होंने समझ लिया था कि गुस्से में लिया गया निर्णय राष्ट्र को भी नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए उन्होंने पहले स्वयं को शांत किया, फिर निर्णय लिया। यही कारण है कि वे केवल नेता नहीं, इतिहास के महानतम नेताओं में गिने जाते हैं।


दोस्तों, रिश्तों में केवल संवाद ही नहीं, धैर्य भी चाहिए। कभी-कभी बहस जीतने से बेहतर है, रिश्ता बचा लेना। इसलिए मेरा मानना है कि हर तर्क का जवाब देना जरूरी नहीं होता। कई बार समय ही सबसे बड़ा समाधान होता है। दोस्तों, गुस्सा छोड़ देना जीवन को सरल बना देता है क्योंकि गुस्सा मन को भारी करता है और शांति मन को हल्का करती है। जीवन में रोजमर्रा की चुनौतियाँ रहेंगी; काम का तनाव, पारिवारिक मतभेद, सामाजिक दबाव आदि सब भी रहेगा। लेकिन इन सबका समाधान गुस्से में नहीं, शांति में है। जब आप शांत रहते हैं, तो निर्णय स्पष्ट होते हैं। जब आप संयमित रहते हैं, तो सम्मान बढ़ता है। इसलिए दोस्तों, आज से एक छोटा-सा नियम अपनाइए, जब भी गुस्सा आए तो 10 सेकंड रुकिए; गहरी साँस लीजिए, फिर सोचिए, “क्या मेरे कहे यह शब्द रिश्ते बचाएँगे या तोड़ देंगे?” अगर जवाब ना में आए तो अपनी बात कहने के स्थान पर चुप रहिए।


याद रखिएगा, गुस्सा एक चिंगारी है जो सब जला सकती है और संयम उसी चिंगारी को ऐसा दीपक बना सकता है, जो रिश्तों को रोशन कर दे। दोस्तों, इसीलिए तो कहा गया है, “सच्ची जीत सामने वाले को हराने में नहीं, खुद के गुस्से को जीतने में है।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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