असंभव, अब असंभव नहीं…
- Nirmal Bhatnagar

- May 9
- 2 min read
May 9, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, मनुष्य का जीवन उसकी परिस्थितियों से नहीं, उसकी कल्पना और दूरदृष्टि से आगे बढ़ता है। हर महान उपलब्धि सर्वप्रथम किसी के मन में एक छोटे से काल्पनिक विचार के रूप में जन्म लेती है। कल्पना ही वह शक्ति है जो हमें वर्तमान से आगे देखने की क्षमता देती है और दूरदृष्टि वह ऊर्जा है, जो उस कल्पना को वास्तविकता में बदलने के लिए हमें प्रेरित करती है। आज दुनिया में जो भी नया, बड़ा और अद्भुत दिखाई देता है, वह कभी न कभी किसी की कल्पना ही थी। लेकिन फ़र्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग अपनी कल्पनाओं को डर के कारण छोड़ देते हैं, और कुछ लोग उन्हीं कल्पनाओं को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं।
जी हाँ दोस्तों, अक्सर हम “असंभव” शब्द से बहुत जल्दी हार मान लेते हैं। लेकिन सच यह है कि असंभव वह नहीं जो किया नहीं जा सकता… असंभव सिर्फ़ वह है, जो अभी तक किया नहीं गया। जिस दिन कोई व्यक्ति उसे कर देता है, उसी दिन दुनिया की सोच बदल जाती है। याद रखिएगा, हर नई खोज, हर नया आविष्कार, हर बड़ी सफलता पहले लोगों को असंभव ही लगती थी। लेकिन जिन्होंने दुनिया बदली, उन्होंने परिस्थितियों से पहले अपनी मनःस्थिती बदली।
याद रखिए दोस्तों, हमारे जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं होती… वह तो हमारे भीतर चलती है। डर, संदेह, असफलता का भय और लोगों की राय—ये सब हमारे कदम रोकने की कोशिश करते हैं। कई बार हम प्रयास करने से पहले ही स्वयं को समझा देते हैं कि “यह मुझसे नहीं होगा।” लेकिन जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य तब सामने आता है, जब मनुष्य यह खोज लेता है कि वह उन कामों को भी कर सकता है, जिनसे वह कभी डरता था। सच्चाई यह है कि हमारी क्षमता हमारी कल्पना से कहीं अधिक विशाल होती है। उसे पहचानने के लिए हमें अपने डर से आगे बढ़ना पड़ता है। डर हमेशा रहेगा, लेकिन साहस वही है जो डर के बावजूद आगे बढ़ने का निर्णय ले। संभवतः डर हमेशा रहेगा। इसलिए सवाल यह नहीं है कि डर है या नहीं… सवाल यह है कि क्या हम डर के बावजूद आगे बढ़ने का साहस रखते हैं?
दोस्तों, सिर्फ सपने देखना काफी नहीं होता। सपनों को दिशा देने के लिए अनुशासन चाहिए, लगातार प्रयास चाहिए, और सबसे ज्यादा चाहिए—खुद पर विश्वास। जब आपकी कल्पना के साथ मेहनत जुड़ जाती है, तो धीरे-धीरे वही सपना आपकी पहचान बन जाता है। इसलिए अपने जीवन को सीमित मत कीजिए। अपने विचारों को छोटा मत कीजिए। दुनिया की सबसे बड़ी सीमाएँ बाहर नहीं, मनुष्य के मन के भीतर होती हैं और जिस दिन आप अपने भीतर की सीमाओं को तोड़ना शुरू कर देते हैं, उसी दिन आपका वास्तविक विकास शुरू होता है।
अंत में बस इतना कहना चाहूँगा—ईश्वर, या यूँ कहें यह जीवन, हमेशा उन्हीं का साथ देता है जो नई राह बनाने का साहस रखते हैं। इसलिए डरिए मत, रुकिए मत, और अपने सपनों को केवल कल्पना बनाकर मत छोड़िए। उस कल्पना से अपना स्पष्ट विज़न बनाइए, अपने कर्म और मेहनत से उन्हें आकार दीजिए। फिर देखिए, जिसे दुनिया कभी “असंभव” कहती थी, वही एक दिन आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाएगी—आपकी सबसे अलग पहचान बन जायेगा।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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