उत्कृष्ट बनने के साथ लोगों को भी बनाएँ उत्कृष्ट…
- Nirmal Bhatnagar

- 4 hours ago
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June 1, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, बचपन में हम सभी को बार-बार कहा जाता है कि मेहनत करो, उत्कृष्ट बनो, अपना सर्वश्रेष्ठ दो और ऐसा काम करो कि लोग तुम्हें याद रखें। इस बात से मिली सीख और विश्वास के कारण हम बचपन से ही स्वीकार लेते हैं कि हम जितने अधिक सक्षम, कुशल और परिश्रमी बनेंगे, हमें उतना ही अधिक सम्मान, अवसर और महत्व मिलेगा। लेकिन वास्तविक जीवन में कई बार एक बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाई देती है और यही जीवन और कार्यक्षेत्र का एक बड़ा विचित्र सत्य है।
मैंने अपने जीवन में अनेक ऐसे लोगों को देखा है जो अपने संगठन, संस्था या कार्यक्षेत्र की रीढ़ बन गए थे। वे समय पर काम करते थे, समस्याओं का समाधान खोजते थे, जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटते थे और हर चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखते थे। शुरुआत में उनकी खूब प्रशंसा हुई। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। लोग उनकी मेहनत को उपलब्धि नहीं, अपेक्षा मानने लगे। उनकी प्रतिबद्धता को विशेषता नहीं, सामान्य व्यवहार समझ लिया गया और फिर एक दिन उन्हें यह महसूस होने लगा कि जितना अधिक वे योगदान दे रहे हैं, उतना ही कम लोग उनके योगदान को देख रहे हैं।
जानते हैं ऐसा क्यों होता है? क्योंकि कार्यस्थल केवल परिणामों से नहीं चलते, वे मानवीय मनोविज्ञान से भी चलते हैं। जब कोई व्यक्ति लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, तो कई बार अनजाने में वह दूसरों की कमियों को उजागर कर देता है। उसका उद्देश्य किसी को छोटा दिखाना नहीं होता, लेकिन उसकी कार्यशैली स्वयं एक मानक बन जाती है और यहीं से कुछ लोगों के भीतर तुलना, असुरक्षा और दूरी पैदा होने लगती है। दूसरी ओर, जब कोई व्यक्ति हर समस्या का समाधान स्वयं करने लगता है, तो संगठन धीरे-धीरे यह मानने लगता है कि सब कुछ तो ठीक चल ही रहा है। लोग भूल जाते हैं कि व्यवस्था स्थिर इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति चुपचाप उसे सम्भाल रहा है।
दोस्तों, यह स्थिति केवल कार्यालयों में नहीं, परिवारों और समाज में भी दिखाई देती है। घर में वह व्यक्ति जो हमेशा जिम्मेदारी निभाता है, सबसे कम धन्यवाद सुनता है। वह शिक्षक जो वर्षों तक विद्यार्थियों का भविष्य बनाता है, अक्सर मंच पर सबसे पीछे बैठा दिखाई देता है। वह कर्मचारी जो हर संकट में संस्था को सम्भालता है, कई बार सबसे अधिक उपेक्षित महसूस करता है।
इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ उत्कृष्टता का अर्थ केवल स्वयं अच्छा काम करना नहीं है। यह तो अच्छा काम करने के साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाने का नाम है। इसलिए उत्कृष्ट कार्य करते वक्त अपना ज्ञान साझा कीजिए। दूसरों को सीखने का अवसर दीजिए। सिर्फ परिणाम मत दीजिए, रिश्ते भी बनाइए क्योंकि लोग; आपने क्या किया था से ज़्यादा ये याद रखते हैं कि आपके साथ काम करते हुए उन्हें कैसा महसूस हुआ था। याद रखिएगा, यदि आपकी सफलता केवल आपके लिए उपयोगी है, तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि आपकी सफलता दूसरों की क्षमता जगाने लगे, तो आपका प्रभाव स्थायी हो जाएगा।
एक बात और, कभी आपको यह महसूस हो कि आपकी मेहनत को वह पहचान नहीं मिल रही जिसकी वह हकदार है, तो अपनी योग्यता पर संदेह मत कीजिए। हर वातावरण उत्कृष्टता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। कई बार समस्या आपकी क्षमता की नहीं होती, बल्कि उस वातावरण में होती है जो आपकी क्षमता को समझ नहीं पाता। इसलिए स्वयं को कम मत आँकिए। अपनी चमक को कम मत कीजिए। अपनी प्रतिभा को छिपाइए मत। बस उत्कृष्टता के साथ विनम्रता, परिणामों के साथ संबंध और सफलता के साथ सहयोग को जोड़ दीजिए। जल्द ही आप पाएंगे कि वातावरण भी सही हो गया है और लोग कहने भी लगे हैं कि “तुम्हारी उत्कृष्टता ने हमें मजबूत और तुम्हारी उपस्थिति ने हमें बेहतर इंसान बनाया है।” दोस्तों, जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल सफल होना नहीं है। बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ आपकी सफलता से और लोग भी सफल होने लगें। यही सच्चा नेतृत्व और सच्ची महानता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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