भीतर की आवाज़ को सुनें…
- Nirmal Bhatnagar

- 1 day ago
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May 28, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो बाहर से देखने वालो को जोखिम भरें नजर आते हैं, लेकिन जो व्यक्ति फ़ैसला ले रहा होता है वो इसे अपनी “कॉलिंग” या “सच्चाई” कहता है। जब ऐसे लोग अपने लिए निर्णय की राह पर आगे बढ़ते हैं तो बाहर से देखने वाले यही लोग इसे पागलपन कहते हैं, जबकि वो सिर्फ़ अपने जुनून को पूरा करते है। ऐसा ही एक पल मेरे जीवन में 36 वर्ष की उम्र में आया था जब मैंने अपना स्थापित आईटी व्यवसाय बंद करने का निर्णय लिया। मेरे इस निर्णय को सुन लोग हैरान थे। मुझसे इस विषय में प्रश्न कर रहे थे; मुझे पागल ठहरा रहे थे। एक दिन मेरे एक ख़ास मित्र ने तो मुझसे प्रश्न करते हुए कहा,“तुम हमेशा कठिन रास्ता क्यों चुनते हो? जब पढ़ाई करना थी, तब तुमने व्यवसाय करना शुरू किया और तमाम स्ट्रगल कर जब वो सेट हुआ, तब तुम उसे बंद कर एक बार फिर परेशानी वाला मार्ग चुन रहे हो।” मैंने पूरी शांति के साथ उनकी बात सुनी और फिर मुस्कुराते हुए कहा, “यार, तुम यह क्यों मान रहे हो कि मुझे दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं?”
दोस्तों, पहली नज़र में आपको यह एक साधारण उत्तर लग सकता है। लेकिन जब आप इसपर गहराई से मंथन करेंगे तो समझ पायेंगे कि यह उत्तर साधारण नहीं जीवन को बदलने वाला है। हममें से ज्यादातर लोग जीवन में निर्णय सिर्फ़ इसलिए नहीं ले पाते क्योंकि वे हर समय दोराहे पर खड़े रहते हैं। वे तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें सुरक्षित जीवन चाहिये या सार्थक जीवन। वे नहीं जानते कि उन्हें जीवन में स्थिरता चाहिए या जीवंतता। उनके लिए अक्सर ख़ुद का मन क्या कह रहा है से ज़्यादा महत्वपूर्ण “लोग क्या कहेंगे…”, हो जाता है और वे इन तमाम गणनाओं के कारण निर्णय नहीं ले पाते हैं और धीमे-धीमे उनका जीवन यूँ ही निकल जाता है।
लेकिन दोस्तों, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ़ अपनी भीतर की पुकार वाला एक ही रास्ता दिखाई देता है। उनके लिए प्रश्न यह नहीं होता कि “यह आसान है या कठिन?” उनका प्रश्न होता है, “क्या यह मेरा रास्ता है?” मेरे लिए भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। मेरे लिए सुरक्षित व्यवसाय को चुनना विकल्प ही नहीं था क्योंकि मैं अपने दिल की आवाज़ को सुनना चाहता था।
चलिए, उस स्थिति को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। मान लीजिए आपको ट्रेन से दिल्ली जाना था और आप गलती से मुंबई जाने वाली ट्रेन में बैठ गए। आपको अपनी इस गलती का एहसास 5-7 स्टेशन गुजरने के बाद होता है। अब आप क्या करेंगे? जिस ट्रेन में बैठे हैं उसी ट्रेन में यात्रा करने के विकल्प को चुनेंगे या फिर थोड़ा परेशानी भरी राह को चुनते हुए मुंबई की ट्रेन को बीच में छोड़, दिल्ली जाने के विकल्प तलाशेंगे? दोस्तों, दिल्ली जाने के विकल्प को चुनना कठिन राह चुनना नहीं है। यह तो उसी रास्ते को चुनना है, जिस पर जाने का निर्णय आपके दिल, दिमाग़ और अंतर्मन ने लिया था।
दोस्तों, हर व्यक्ति के भीतर ईश्वर प्रदत्त क्षमता और संभावना होती है, लेकिन उसे पहचानने और उस राह पर चलने के लिए साहस की जरूरत होती है क्योंकि दुनिया अक्सर वही राह स्वीकार करती है जो पहले से बनी हुई हो और आपका मन अक्सर आपको वहाँ बुलाता है जहाँ आपकी क्षमता और योग्यतानुसार कुछ नया जन्म लेना चाहता है।
याद रखिएगा, हर सुरक्षित निर्णय सही नहीं होता और हर कठिन निर्णय गलत नहीं होता। कई बार जो रास्ता बाहर से कठिन दिखता है, वही भीतर सबसे स्वाभाविक होता है। लोग पूछेंगे—इतना क्यों कर रहे हो? जो चल रहा है उसे क्यों बदल रहे हो? लेकिन हर प्रश्न का उत्तर देना जरूरी नहीं। कुछ रास्ते समझाने के लिए नहीं… जीने के लिए होते हैं।
दोस्तों, यदि आपके भीतर कोई पुकार है, कोई उद्देश्य है, कोई ऐसा काम है जो आपको जीवित महसूस कराता है, तो उसे सिर्फ इसलिए मत छोड़िए क्योंकि वह आसान नहीं है। क्योंकि अंत में जीवन यह नहीं पूछेगा, तुमने कितना सुरक्षित खेला? वह पूछेगा, क्या तुमने वह जीवन जिया जो तुम्हें दिया गया था? और अंत में बस एक बात; जिस दिन आपका उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है, उस दिन रास्ते कठिन या आसान नहीं रहते… वे केवल अपने हो जाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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