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असली मुकाबला मैदान में नहीं, मन में होता है!!!

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
2 minutes ago
3 min read

Sep 30, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, कुछ दिन पहले एक युवा खिलाड़ी से बातचीत करने का अवसर मिला। वह पहली बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लेने जा रहा था। सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद उसने वर्षों तक मेहनत की, लगातार अभ्यास किया और आखिरकार राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बना ली थी। उसकी कहानी प्रेरणादायक थी, लेकिन उस दिन उसके चेहरे पर आत्मविश्वास से ज्यादा चिंता दिखाई दे रही थी। जब मैंने उससे इस विषय में पूछा, तो वह बोला, “सर, अगर मैं हार गया तो?” एक क्षण रुककर उसने धीमी आवाज़ में अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “मुझे लगता है बाकी खिलाड़ी मुझसे बेहतर हैं। शायद मैं इस स्तर के लिए बना ही नहीं हूँ।”


मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर सीधे एक सपाट प्रश्न पूछा, “तुम अपने प्रतिद्वंद्वी से डर रहे हो या अपने विचारों से?” वह अभी भी चुप था। मैंने बात आगे बढ़ते हुए कहा, “तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी तुम्हारे सामने कुछ समय के लिए होगा, लेकिन तुम्हारे विचार पूरे समय तुम्हारे साथ रहेंगे। याद रखो, असली मुकाबला मैदान में उतरने से बहुत पहले शुरू हो जाता है।” इसके साथ ही मैंने उससे यह भी कहा कि मैच से पहले डर लगना असामान्य नहीं है और हर डर को खत्म करना भी ज़रूरी नहीं है। बस इतना तय करना जरूरी है कि आज निर्णय तुम्हारा डर करेगा या तुम खुद?


अगले दिन जब वह मैदान में उतरा तब उसका ध्यान परिणाम पर नहीं, अपने अगले प्रयास पर था। उसने हर क्षण अवसर को देखने का प्रयास किया और अंततः मैच जीत गया। लेकिन दोस्तों, मेरे लिए उसकी जीत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मैच का परिणाम नहीं था। हकीकत में उसने उस दिन अपने मन को जीता था।


दोस्तों, हम सबके जीवन में भी ऐसे मुकाबले रोज़ चलते हैं। कभी क्रोध हमें तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाता है। कभी डर हमें अवसर से पीछे हटाता है। कभी अहंकार हमें अपनी गलती स्वीकार नहीं करने देता। कभी तुलना हमारी उपलब्धियों को छोटा कर देती है और कभी निराशा हमारे भीतर यह विश्वास पैदा कर देती है कि अब प्रयास करने का कोई अर्थ नहीं। फिर हम इन भावनाओं के अनुसार निर्णय लेते हैं और बाद में कहते हैं, “मैं तो ऐसा ही हूँ।” लेकिन क्या सचमुच हम ऐसे ही हैं? बिल्कुल नहीं। हमारी भावनाएँ हमारी पहचान नहीं हैं। क्रोध आना स्वाभाविक है, लेकिन क्रोध में क्या करना है, यह हमारा चुनाव है। डर लगना स्वाभाविक है, लेकिन डर के कारण रुक जाना ज़रूरी नहीं। निराश होना स्वाभाविक है, लेकिन निराशा के कारण प्रयास छोड़ देना हमारा निर्णय है।


याद रखिएगा, भावना एक संकेत हो सकती है, आदेश नहीं। विचार एक संभावना हो सकती है, सत्य नहीं। दोस्तों, मन में आया हर विचार सही नहीं होता और महसूस हुई हर भावना पर तुरंत प्रतिक्रिया देना भी ज़रूरी नहीं होता। यही समझ आत्म-नियंत्रण की शुरुआत है। इसलिए अगली बार जब आपको गुस्सा आए, तो तुरंत जवाब देने के बजाय कुछ क्षण रुकिए। जब डर आपको रोके, तो खुद से पूछिए, “यह वास्तविक खतरा है या मेरी आशंका?” जब मन कहे, “मैं असफल हूँ”, तो ख़ुद से पूछिए, “क्या मैं असफल हूँ, या मेरा एक प्रयास असफल हुआ है?” इन सवालों के जवाब शायद आपकी पूरी दिशा बदल दें।


दोस्तों, अपने मन पर नियंत्रण पाने के लिए इन तीन बातों को अपनी आदत बनाइए-

पहली, रुकना—ताकि तत्काल प्रतिक्रिया आपका निर्णय न बन जाए। दूसरी, देखना, ताकि आप समझ सकें कि भीतर वास्तव में चल क्या रहा है और तीसरी चुनना कि आपकी प्रतिक्रिया आपके डर, क्रोध या अहंकार से तय होगी या आपके मूल्यों से। ऐसा करना आपको एहसास करवाएगा कि मन में आने वाले हर विचार का अनुसरण करना और मन में उठने वाली हर भावना के अनुसार व्यवहार करना, ज़रूरी नहीं है।


दोस्तों, मन को जीतने का अर्थ मन को दबाना नहीं है। मन का राजा वही है, जो अपने मन की हर बात मानने के स्थान पर, यह तय करना जानता है कि कौन-सी बात माननी है और कौन-सी छोड़ देनी है। याद रखिएगा जीवन की सबसे बड़ी स्वतंत्रता परिस्थितियों को नियंत्रित करने में नहीं, अपनी प्रतिक्रिया चुनने में है क्योंकि मैदान में उतरने से पहले ही मन अगर हार गया, तो जीत की संभावना बहुत कम हो जाती है। अगर दुनिया जीतना चाहते हो तो सबसे पहले अपने मन को जीतो क्योंकि हमारा सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी बाहर नहीं, अक्सर हमारे भीतर बैठा होता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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