आत्मिक स्वतंत्रता चाहते हैं तो बचें मन और माया के खेल से…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 hours ago
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Mar 18, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, बात सुख की हो या दुख की, ख़ुशी की हो या ग़म की, अच्छाई की हो या बुराई की, सबकी जड़ें हमारे मन के भीतर रहती है। लेकिन इसके विपरीत अक्सर हम मान कर चलते हैं कि हमें परेशान या संतुष्ट करने वाली सभी चीजें बाहरी होती हैं। जैसे धन का आकर्षण, पद की चाह, प्रशंसा की लालसा, भोग-विलास की इच्छा, आदि। अगर आप गहराई से जाकर इसे देखेंगे तो पायेंगे कि इन सबका जन्म बाहर नहीं, हमारे मन के भीतर होता है। इसी बात को भारतीय दर्शन शास्त्र ने ‘मन और माया के खेल’, के रूप में बहुत ही सरल और सुंदर तरीके से समझाया है। आइए, आज हम इस खेल को आसान शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं।
दोस्तों, माया सिर्फ़ धन-दौलत या भौतिक वस्तुओं का नाम नहीं है। यह तो हर वह चीज है जो हमें आकर्षित और भ्रमित करती है और हमें हमारे वास्तविक स्वरूप या लक्ष्य से दूर ले जाती है और जो उस आकर्षण की ओर खिंचता है, वह है हमारा मन। याने हमारा मन जब आकर्षण के जाल में फँसता है तब जीवन में भटकाव शुरू होता है। उदाहरण के लिए सबसे पहले हमारे मन में एक इच्छा जन्म लेती हैं। फिर यही छोटी-सी इच्छा समय के साथ धीरे-धीरे आसक्ति बन जाती है। जिसके कारण हम सोचने लगते हैं कि अगर यह मिल जाए तो सुख मिल जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। जिस वक्त हमें वह चीज मिलती है तब तक हमारा मन कुछ और चाहने लगता है अर्थात् उसके अंदर एक नई इच्छा जन्म ले लेती है और इस तरह हमारा मन लगातार भटकता रहता है। सीधे और सपाट शब्दों में कहूँ तो मन को भ्रम में उलझाए रखना ही माया की सबसे बड़ी चाल है।
मन को माया के भ्रम जाल से बचाने के विषय में बताते हुए हमारे वेद और उपनिषद कहते हैं, “मनुष्य का असली स्वरूप आनंदमय है।” याने उसे सुख पाने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जब मन माया के आकर्षण में उलझ जाता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।
अगर मन और माया के इस खेल को समझ लिया जाए याने उपरोक्त सत्य को समझ लिया जाए तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है। इसका एक अद्भुत उदाहरण सिद्धार्थ गौतम याने गौतम बुद्ध है। राजकुमार सिद्धार्थ के पास महल, वैभव, शक्ति और ऐश्वर्य जैसी जीवन की हर सुविधा थी। अगर बाहर से उनके जीवन को देखा जाये, तो वह निश्चित तौर पर पूर्ण नजर आता था। लेकिन एक दिन जब उन्होंने संसार के दुख याने बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु को नज़दीक से देखा, तब उन्हें एहसास हुआ कि यह सारा वैभव स्थायी नहीं है। वे समझ गए कि मन जिन चीज़ों को सुख का स्रोत समझ रहा है, वे वास्तव में अस्थायी हैं। यही समझ उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई और वे राजमहल छोड़ कर आत्मज्ञान की खोज में निकल पड़े। वर्षों की साधना के बाद जब उन्हें बोधि प्राप्त हुआ, तब उन्होंने दुनिया को बताया कि मन की इच्छाएँ ही दुख का मूल कारण हैं।
दोस्तों, जब मन इच्छाओं के जाल में फँसता है, तब हम याने मनुष्य बेचैन हो जाता है और जब मन इच्छाओं से ऊपर उठता है, तब हमारे भीतर शांति जन्म लेती है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि शांति के लिए हमें संसार छोड़ देना चाहिए, इसका अर्थ तो केवल इतना है कि हमें संसार में रहते हुए माया के इस जाल को पहचानना सीखना चाहिए। याद रखियेगा दोस्तों, धन, पद, प्रतिष्ठा आदि सब जीवन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जीवन का उद्देश्य नहीं। यदि मन इनसे बंध गया, तो ये माया बन जाएँगे और अगर मन इनसे ऊपर उठ गया, तो ये साधन बन जाएँगे।
इसलिए ही कहा गया है कि जीवन की सच्ची स्वतंत्रता तब मिलती है जब मनुष्य यह समझ लेता है कि सुख बाहर नहीं, अपने भीतर है। इसलिए अपने मन को पहचानिए; अपनी इच्छाओं को समझिए और हर आकर्षण के पीछे छिपे भ्रम को देखने का अभ्यास कीजिए क्योंकि जिस दिन मन माया को पहचान लेता है, उसी दिन से आत्मिक स्वतंत्रता की यात्रा शुरू हो जाती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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