आनंद की जड़ हमारे स्वभाव में है !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 17 hours ago
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Apr 11, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, मेरी नजर में आनंद को अपने भीतर तलाशने के स्थान पर, पूरी दुनिया में उसे खोजना ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है। ऐसा मैं सिर्फ़ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हकीकत में आनंद कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने स्वभाव में ही छिपा होता है। जी हाँ साथियों, वास्तव में हम सब जन्म से ही आनंदित होते हैं। एक छोटे बच्चे को देखिए, उसे आनंदित रहने के लिए न तो कोई कारण चाहिए होता है और ना ही कोई उपलब्धि। वह अपने आप में ही हँसता है, मुस्कुराता है, खुश रहता है क्योंकि वह अपने मूल स्वभाव में होता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हम उस स्वभाव से दूर होते जाते हैं। हमारा मन धीरे-धीरे शिकायतों का घर बन जाता है। हम धन्यवाद देना भूल जाते हैं, प्रेम महसूस करना भूल जाते हैं और दोषारोपण करना सीख जाते हैं। कभी परिस्थितियों को दोष देते हैं, कभी लोगों को, और कभी किस्मत को। लेकिन कभी ख़ुद से प्रश्न नहीं करते कि मैं भीतर से कितना शांत हूँ।
दोस्तों, जीवन की इस सच्चाई को हमेशा याद रखियेगा, जब तक हम अपने जीवन की जिम्मेदारी दूसरों पर डालते रहेंगे, तब तक हम भीतर से ना तो शांत रह सकते हैं और ना ही ख़ुश क्योंकि शांति और ख़ुशी बाहर से नहीं आती, वह भीतर से पैदा होती है। सहमत ना हों तो जरा गौर से अपने आस-पास ध्यान से देखियेगा, आप पायेंगे कि प्रकृति की हर कृति अपने अस्तित्व से खुश है। पशु-पक्षी आपको हर क्षण सहज अपने आप में ही आनंदित नजर आयेंगे।
कोयल को ही देख लीजिए, वह हमेशा मधुर ही गाती है, क्योंकि वह अपने स्वभाव के अनुसार जीती है। न वह किसी से तुलना करती है और ना ही शिकायत। वह तो बस जो ईश्वर से मिला है, उसी में ख़ुद को पूर्ण मानती है। इसके विपरीत अगर हम ख़ुद को देखें तो हम अक्सर तुलना में उलझ जाते हैं और अपेक्षाओं में फँस जाते हैं। याने हम अपने मूल स्वभाव से भटक जाते हैं और फिर धीरे-धीरे अपनी सहजता खो देते हैं।
दोस्तों, हम भूल जाते हैं कि सुख और दुःख दोनों ही अस्थायी हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन हम उनसे इतना जुड़ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। जब सुख आता है, तो हम उसे पकड़कर रखना चाहते हैं और जब दुःख आता है, तो उससे भागना चाहते हैं। यहीं से हमारे जीवन में असंतुलन शुरू होता है और अगर हम सुख और दुख, दोनों ही स्थितियों को स्वीकार करना सीख लें तो हम जीवन में संतुलन बना लेते हैं। याने जब हम समझ जाते हैं कि सुख भी स्थायी नहीं है, और दुःख भी नहीं, तब हम धीरे-धीरे “स्थितप्रज्ञ” की अवस्था की ओर बढ़ते हैं, जहाँ बाहर की परिस्थितियाँ हमारे भीतर की शांति को प्रभावित नहीं कर पाती।
दोस्तों, इसका अर्थ भावनाहीन बनना नहीं है, इसका अर्थ तो बस इतना है कि हमें भावनाओं का गुलाम नहीं बनना है। हम प्रेम करें, कृतज्ञ रहें, लेकिन अपने भीतर की स्थिरता को न खोएँ। दोस्तों, यकीनन यह जीवन बहुत सरल है उसे जटिल बनाने की जरूरत नहीं है। सामान्यतः हम ही अपनी सोच से इसे उलझा देते हैं। अगर हम प्रतिदिन कुछ क्षण रुककर अपने भीतर झाँकना शुरू कर दें और अगर शिकायतों की जगह कृतज्ञता को जगह दें; दूसरों को दोष देने के बजाय खुद को समझना शुरू करें, तो हम धीरे-धीरे अपने असली स्वभाव के करीब पहुँचने लगेंगे। याने हम शांति, प्रेम और आनंद के क़रीब पहुँचने लगेंगे।
बस इतना याद रखिएगा, आनंद कोई लक्ष्य नहीं है जिसे पाना है। आनंद तो हमारी पहचान है, जिसे सिर्फ पहचानना है। इसलिए आज से एक छोटा सा प्रयास करें और शिकायतों को कम कर, धन्यवाद ज्यादा देना शुरू करें। इसी तरह दोष कम दें और प्रेम ज़्यादा देना शुरू करें और सबसे महत्वपूर्ण जमाने से ज्यादा खुद से जुड़ना शुरू करें क्योंकि जब आप स्वयं में स्थित हो जाते हैं, तो जीवन अपने आप सुंदर हो जाता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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