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सुकून - लोगों को बदलने में नहीं, स्वीकारने में है

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Apr 10, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

सुकून-लोगों को बदलने में नहीं, स्वीकारने में है


दोस्तों, तेज रफ़्तार में दौड़ती आज की दुनिया में हम सब अपने-अपने काम, लक्ष्य और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे पास लोगों को समझने का धैर्य कम होता जा रहा है। हमें हर चीज़ अपने अनुसार चाहिए याने जब शांति चाहते हैं, तो शांत माहौल, साथ चाहिए तो अच्छे लोग, काम करना है तो समाज से सहयोगी व्यवहार और अगर कोई हमारी यह अपेक्षा पूरी ना करे तो हम उसे तत्काल ग़लत ठहरा देते हैं। चलिए, इस बात को हम आज के युग के एक काल्पनिक नज़ारे से समझने का प्रयास करते हैं-


सौरभ नाम का युवा हाल ही में ट्रांसफर के चलते नए शहर में शिफ्ट हुआ था। सबसे पहले उसने एक अच्छे अपार्टमेंट में घर लिया, लेकिन जल्द ही उसे एहसास हुआ कि उसका पड़ोसी थोड़े अलग स्वभाव का है। जहाँ सौरभ को शांत माहौल और जल्दी सोना पसंद था, वहीं उसका पड़ोसी अक्सर तेज आवाज में गाने सुनता और देर रात तक जगता। जब भी कोई उससे इस विषय में कुछ कहता तो वह बहस करने लगता।


शुरुआती दिनों में सौरभ ने एडजस्ट करने की कोशिश करी लेकिन बीतते समय के साथ उसका धैर्य टूटने लगा। एक बार दिन भर की अथक मेहनत के बाद सौरभ जब थककर घर पहुँचा, तभी पड़ोसी के घर से एक बार फिर तेज संगीत बजाने लगा। जिसकी वजह से वह बहुत परेशान हो गया और मन ही मन बुदबुदाने लगा, ‘हे भगवान, आपने कैसे-कैसे लोग इस दुनिया में भेज रखे हैं? क्या ये इस दुनिया में सिर्फ दूसरों को परेशान करने के लिए आए हैं?’


उस रात सौरभ बेचैनी की वजह से सो नहीं पाया। अगले दिन ऑफिस में उसे थका हुआ देख हमेशा शांत और संतुलित रहने वाले एक सीनियर ने उससे इसका कारण पूछा। सौरभ ने सारी बात कह सुनाई, जिसे सुन वे मुस्कुराते हुए बोले, ‘सौरभ अक्सर हम दूसरों की मनःस्थिति को जाने बिना, अपनी अपेक्षाओं के आधार पर, तत्काल धारणाएँ बना लेते हैं। हो सकता है, वह इंसान अपने जीवन में किसी ऐसी स्थिति से गुजर रहा हो, जिसके बारे में हमें अंदाज़ा ही ना हो।’


सीनियर की कहीं बात सौरभ के दिल को छू गई। उसने उसी क्षण तय किया कि वह अपने पड़ोसी को सिर्फ 'समस्या' के रूप में देखने के स्थान पर ‘इंसान’ के रूप में पहचानने का प्रयास करेगा। इस निर्णय के बाद सौरभ ने मौक़ा देख अपने पड़ोसी से संवाद शुरू किया और कुछ ही दिनों में वह जान गया कि उसका पड़ोसी हाल ही के दिनों में अपनों को खोने के कारण अकेला रहता है और इसी वजह से अंदर से पूरी तरह टूट चुका है। सौरभ अब जान गया कि पड़ोसी का व्यवहार उसकी पीड़ा का परिणाम था, न कि उसकी प्रकृति का। उस दिन सौरभ को जीवन की एक गहरी समझ मिली, ‘हम लोगों को अक्सर उनके व्यवहार के आधार पर तौलते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपे कारणों को नहीं समझते।’


दोस्तों, जीवन में हमारा सामना अलग-अलग तरह के लोगों से होगा। इनमें से कुछ हमें अपने जैसे सरल और सहज लगेंगे तो कुछ बिल्कुल विपरीत याने कठिन और उलझे हुए। अगर आप हर कठिन और उलझे हुए व्यक्ति को अपने जैसा बनाने का प्रयास करेंगे तो आप ख़ुद थक जाएँगे। इसलिए उन्हें बदलने के स्थान पर समझने का प्रयास करें। इसके लिए आपको उसकी अनकही कहानी को समझना होगा। अगर आप ऐसा कर पाये तो यह जीवन आसान हो जाएगा।


हर व्यवहार के पीछे एक कारण और हर इंसान के भीतर एक अनकही कहानी होती है। इसलिए जब कोई आपको परेशान करे, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय थोड़ा ठहरिए और ख़ुद को याद दिलाइए, शायद वह इंसान गलत ना हो, बस उसे अधूरा समझा गया हो। याद रखिएगा, जीवन का सुकून दूसरों को बदलने में नहीं, उन्हें स्वीकारने और समझने में है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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