आप ख़ुद में ही सम्पूर्ण हैं...
- Nirmal Bhatnagar

- 2 hours ago
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May 2, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन की सबसे बड़ी सीख अक्सर अनुभवों से मिलती है, शब्दों से नहीं। कभी-कभी हम लोगों, रिश्तों और परिस्थितियों में इतना उलझ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। चलिए, एक सच्ची घटना से इसे समझने का प्रयास करते हैं-
शहर में एक संवेदनशील, सच्ची और दिल से जुड़ने वाली युवा लड़की रहती थी, जो अपने परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों को बहुत महत्व देती थी। हर किसी की मदद करना, सबके लिए समय निकालना और सबको खुश रखने का प्रयास करना उसके स्वभाव का हिस्सा था। बीतते समय के साथ उसे एहसास हुआ कि अपनी तरफ़ से सर्वश्रेष्ठ देने के बाद भी उसे अपनों से उतना प्यार, सम्मान और समय नहीं मिलता, जितना वो देती है। अक्सर लोग उससे तब ही बात करते या मिलते थे, जब उन्हें कोई काम होता था और जो थोड़े-बहुत लोग उसके साथ थे, वे भी सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए दिखावा कर रहे थे।
इतना सब होने के बाद भी वह सच्चाई को स्वीकारने के लिए राजी नहीं थी। उसे हमेशा लगता था कि शायद उसमें ही कुछ कमी है। इसलिए वो अपनी ओर से सबको खुश और संतुष्ट रखने का और ज़्यादा प्रयास करती थी। कुल मिलाकर कहूँ तो अब वह अपने से ज़्यादा दूसरों का ध्यान रखने लगी; अपनी प्राथमिकताओं से ज़्यादा उनकी प्राथमिकताओं को महत्व देने लगी; आपसी व्यवहार में और ज्यादा झुकने लगी, और हमेशा खुद को साबित करने की कोशिश करने लगी।
लेकिन एक दिन उसने इन सब बातों से परेशान होकर खुद से सवाल किया, “क्या मैं अपना जीवन जी रही हूँ या उसे उन लोगों के लिए बर्बाद कर रही हूँ जो मुझे समझते ही नहीं हैं।” इस प्रश्न का उत्तर मिलते ही उसने निर्णय लिया कि अब वो सबसे पहली प्राथमिकता ख़ुद को देगी और अब किसी से भी प्यार, सम्मान आदि की भीख नहीं माँगेगी और ना ही खुद को साबित करने की कोशिश करेगी।
दोस्तों, उसका निर्णय था तो एकदम सही क्योंकि जहाँ आपको अपनी कीमत समझानी पड़े, वह जगह आपकी होती ही नहीं है। इस निर्णय के बाद उस युवा लड़की ने खुद पर ध्यान देना शुरू किया और कुछ ही दिनों में उसने भीतर की शांति को महसूस किया और पहली बार उसने खुद को वैसे स्वीकार किया, जैसी वह थी। इस निर्णय के बाद कुछ लोग उसके जीवन से दूर चले गए, लेकिन जो बचे, वे सच्चे थे।
दोस्तों, सामान्यतः ज्यादातर लोग अपनी कीमत उन लोगों से तय करने लगते हैं, जो हमें समझते ही नहीं हैं और यही उनके जीवन की सबसे बड़ी गलती होती है। जी हाँ, हम दूसरों से तुलना करते हैं, दूसरों जैसा बनने की कोशिश करते हैं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही पहचान खो देते हैं। जबकि सच्चाई तो यह है कि हर व्यक्ति अनूठा और अनोखा है। इस जहां में हर किसी की अपनी एक अलग भूमिका है। जब आप खुद की तुलना किसी और से करते हैं, तो आप अपने ही अस्तित्व से शिकायत कर रहे होते हैं और जहाँ शिकायत होती है, वहाँ संतोष नहीं होता।
दोस्तों, वैसे भी रिश्ते कभी भी एकतरफा नहीं होते; जहाँ सिर्फ एक व्यक्ति प्रयास करता है, वहाँ संतुलन नहीं होता। याद रखें, जहाँ सम्मान, प्रेम और समझ “म्यूचुअल” हो, वहीं सच्चा रिश्ता होता है। वैसे भी यह जीवन बहुत छोटा है। उसे उन लोगों और चीजों में खर्च मत कीजिए जहाँ आपको खुद को साबित करना पड़े। इसके बजाये वहाँ रहिए, जहाँ आपको बिना कहे समझा जाए, जहाँ आपकी मौजूदगी की कद्र हो और इन सबसे महत्वपूर्ण, खुद के साथ अपना रिश्ता मजबूत बनाइए क्योंकि जब आप खुद को स्वीकार कर लेते हैं, तो दुनिया भी आपको उसी नजर से देखने लगती है। अंत में इतना और कहूँगा कि खुद की कीमत पहचानिए और उसे कभी कम मत होने दीजिए क्योंकि आप खुद में ही सम्पूर्ण हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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