जिएँ उद्देश्य के साथ…
- Nirmal Bhatnagar

- 3 hours ago
- 3 min read
Apr 30, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, किसी भी संगठन की सफलता केवल उसकी नीतियों, संसाधनों या तकनीक पर निर्भर नहीं करती, उसकी असली ताकत उसके लोग होते हैं क्योंकि उनका जुड़ाव, उनका समर्पण और उनका उद्देश्य ही कंपनी के कार्यों को गति देता है; दिशा देता है। लेकिन अगर आप किसी वजह से संस्था से जुड़े लोगों का ध्यान ना रख पायें तो उनमें समय के साथ उदासीनता आ जाती है और उदासीनता एक ऐसी स्थिति है, जो अगर संस्था के सदस्यों में आ जाए तो धीरे-धीरे सबसे मजबूत संगठन भी भीतर से कमजोर हो जाता है। याने जब व्यक्ति अपने काम से जुड़ाव महसूस नहीं करता, तब लक्ष्य “जीने के भाव” की जगह सिर्फ “पूरा करने” की चीज और “काम” बोझ बन जाता है। ऐसे में व्यक्ति काम तो करता है, लेकिन बेमन से; अपनी अधूरी क्षमता से। याने वह गुज़रते वक़्त के साथ सिर्फ़ बहाव के साथ बहने लगता है। उसके कार्य में न तो दिशा होती है, ना ही नई सोच और न ही उत्साह। यह एक ऐसी अवस्था है, जहाँ व्यक्ति अपनी क्षमता से कम जीने लगता है।
दोस्तों, यह स्थिति सिर्फ़ संगठन की समस्या नहीं है, यह हमारे व्यक्तिगत जीवन की भी सच्चाई है। जब हम अपने जीवन के उद्देश्य से भटक जाते हैं, तब हम जीवन को जीते नहीं काटते हैं। याने जीवन में जो हो रहा होता है, हम उसी में बहते जाते हैं। दिन तो गुजरते रहते हैं, लेकिन जीवन से उत्साह और संतोष का भाव नदारद हो जाता है। इसलिए ही ख़ुद से समय-समय पर यह सवाल पूछना बहुत आवश्यक है, “क्या मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहा हूँ?” सुनने में यह सवाल बहुत साधारण लग सकता है, लेकिन इसका उत्तर हमारे जीवन की दिशा तय कर सकता है। अगर हम ईमानदारी से इस सवाल का जवाब दें, तो हमें पता चलेगा कि हकीकत में हम अपने जीवन में कहाँ खड़े हैं?
दोस्तों, यह प्रश्न ना सिर्फ आपके व्यक्तिगत जीवन को दिशा देता है बल्कि आपको अपनी प्रोफेशनल जिम्मेदारियों को भी अच्छे से पूर्ण करने में मदद करता है। आपको एक बेहतरीन टीम बनाने में; उसका सदस्य बनने में अहम् रोल निभाता है। इसलिए ही किसी भी संस्था में टीमवर्क को केवल एक शब्द नहीं बल्कि जिम्मेदारी माना जाता है। जब हर व्यक्ति यह सोचता है कि “मैं क्या योगदान दे सकता हूँ?” तभी एक मजबूत टीम बनती है। लेकिन जब हर कोई सिर्फ यह सोचता है कि “मुझे क्या मिलेगा?” तब टीम कमजोर हो जाती है। याद रखियेगा दोस्तों, जीवन के हर क्षेत्र में, फिर चाहे वह ऑफिस हो, परिवार हो, या समाज, सफलता हमेशा सामूहिक प्रयास से ही मिलती है और उस सामूहिक सफलता की शुरुआत हर व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रयास से होती है।
चलिए दोस्तों, अब बात करते हैं “थोड़ा अलग” बनने की… इस दुनिया में हर कोई सफल होना चाहता है, लेकिन बहुत कम लोग उस संघर्ष को स्वीकार करते हैं, जो सफलता की असली कीमत है। अलग बनने का मतलब है, ‘खुद से लड़ना’। याने अपने आलस्य, अपने डर, अपने बहानों से लड़ना और आगे बढ़ना। दोस्तों, ख़ुद के विरुद्ध लड़ा गया यह युद्ध कभी आसान नहीं होता, इसके लिए आपको सबसे पहले अपनी उदासीनता से लड़ना होता है। यह लड़ाई ही आपको साधारण से असाधारण बनाती है।
दोस्तों, याद रखियेगा, उदासीनता हमें धीरे-धीरे अंदर से खत्म कर देती है, जबकि उद्देश्य हमें ऊर्जा देता है। इसलिए अपने काम को सिर्फ जिम्मेदारी मत समझिए, उसे अपना योगदान समझिए। हर दिन खुद से यह पूछिए, “क्या मैं आज कुछ बेहतर कर सकता हूँ?”, “क्या मैं अपनी टीम, अपने संगठन और अपने जीवन में कुछ मूल्य जोड़ रहा हूँ?” अगर जवाब “हाँ” है, तो आप सही दिशा में हैं और अगर “ना” है तो यह संकेत है कि हमें अपनी सोच पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
अंत में इतना ही याद दिलाऊँगा कि जीवन और संगठन दोनों वहीं आगे बढ़ते हैं, जहाँ लोग सिर्फ काम नहीं करते, बल्कि उद्देश्य के साथ काम करते हैं। इसलिए आज से तय कीजिए कि हमें उदासीन नहीं, जागरूक बनना है। हमें सिर्फ अपनी मौजूदगी नहीं दिखानी है, बल्कि प्रभावशाली बनना है क्योंकि जब आप अपना सर्वश्रेष्ठ देना शुरू करते हैं, तब आपकी पहचान भी बदलती है और आपका जीवन भी।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




Comments