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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बच्चों की परवरिश…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
2 days ago
3 min read

Oct 1, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अगर आप पलट कर जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि आज से कुछ साल पहले तक बच्चा अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अपने माता-पिता के पास जाता था, किताब खोलता था, शिक्षक से पूछता था या किसी बड़े से बातचीत करता था। आज वही बच्चा कुछ सेकंड में एआई से अपना ज़वाब पा लेता है। तकनीक ने सीखने की दुनिया को असाधारण रूप से आसान बना दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज सवालों के जवाब दे सकती है, कठिन विषय समझा सकती है, विचार दे सकती है, भाषा सुधार सकती है एवं सीखने को और अधिक व्यक्तिगत भी बना सकती है।


तकनीकी निर्भरता की वजह से सामान्य जीवन में आया यह बदलाव आज पैरेंटिंग के लिए भी सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सवाल पूछने और जवाब देने की प्रक्रिया ना सिर्फ़ बच्चे के ज्ञान में वृद्धि करती थी, बल्कि उसे जीवन जीना सिखाने में मदद भी करती थी। इसके बिना कहीं ना कहीं बच्चों से होने वाली चर्चा आज ऊपरी और औपचारिक होती जा रही है। आज जब एआई उन्हें हर सवाल का ज़वाब तुरंत दे रहा है, तब हमारे लिए बच्चों की सवाल पूछने की क्षमता को बचाए रखना एक चुनौती हो गया है।


दोस्तों, अगर आप भी इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं तो सबसे पहले एआई की कुछ सीमाएँ समझ लीजिए। एआई जानकारी तो दे सकता है, लेकिन जिज्ञासा पैदा नहीं कर सकता। इसी तरह एआई विचार दे सकती है, लेकिन रचनात्मकता की जगह नहीं ले सकती। एआई बातचीत कर सकती है, लेकिन सहानुभूति महसूस नहीं कर सकती और एआई समस्या का समाधान तो सुझा सकती है, लेकिन मानवीय विवेक का विकल्प नहीं बन सकती। इसलिए हमें समझना होगा कि आज माता-पिता की भूमिका बच्चों को एआई से दूर रखने की नहीं, बल्कि उन्हें एआई के साथ समझदारी से जीना सिखाने की है।


एजुकेशनल कंसलटेंट और ट्रेनर के रूप में शिक्षकों के साथ काम करते हुए मैंने कई बार देखा है कि जब बच्चे को हर समस्या का समाधान तुरंत मिल जाता है, तो वह समस्या से जूझने की अपनी क्षमता को धीरे-धीरे खोने लगता है। जबकि समस्या से जूझना ही उसे संघर्षशील बनाता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए बच्चा विद्यालय से दिए किसी प्रोजेक्ट को कुछ ही मिनिटों में एआई की मदद से पूरा करके ले आता है। ऐसे मैं उसने अपना गृहकार्य तो पूर्ण कर लिया, लेकिन क्या सही मायने में सीखना पूरा हो पाया? नहीं ना!


दोस्तों, किसी प्रोजेक्ट या कार्य को देने से पहले बच्चे से कुछ विचारोत्तेजक प्रश्न अवश्य करें - “तुम्हें इस प्रोजेक्ट के बारे में क्या लगता है?”, “इससे तुम क्या सीखोगे?”, “तुमने अब तक क्या खोजा?” या “कहाँ कठिनाई आ रही है?” ऐसे प्रश्न उसकी जिज्ञासा और सोचने की क्षमता को बढ़ाएँगे। इसके बाद एआई को उसके लर्निंग पार्टनर के रूप में उपयोग करने दें। साथ ही समझाएँ कि एआई की जानकारी को आँख बंद करके स्वीकार न करें। उसे विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी की जाँच और तुलना करनी चाहिए तथा अंत में अपनी सीख को अपनी भाषा में प्रस्तुत करना चाहिए।


दोस्तों, आधुनिक युग का एक महत्वपूर्ण पेरेंटिंग प्रिंसिपल कहता है, “एआई को बच्चे के लिए शॉर्टकट मत बनने दीजिए; उसे बच्चे का थिंकिंग पार्टनर बनाइये। इसके साथ ही यह भी याद रखें कि बचपन केवल शैक्षणिक प्रदर्शन का नाम नहीं है। बच्चे को बाहर खेलना चाहिए, किताबों के पन्ने पलटने चाहिए, पेड़ों और प्रकृति के साथ समय बिताना चाहिए, परिवार से बातचीत करनी चाहिए, दोस्तों के साथ असहमति और मेल-मिलाप का अनुभव करना चाहिए और कभी-कभी बिना किसी स्क्रीन के बस बोर भी होना चाहिए क्योंकि कल्पनाएँ अक्सर वहीं जन्म लेती हैं, जहाँ पहले से तैयार मनोरंजन मौजूद नहीं होता।


दोस्तों, बच्चों को कठिन परिस्थितियों में तुरंत समाधान मत दीजिए। उसे स्वयं कोशिश करने दीजिए, असफल होने दीजिए और फिर दोबारा प्रयास करने दीजिए। याद रखिए, उत्तर तक पहुँचने की यात्रा अक्सर स्वयं उत्तर से कहीं अधिक शिक्षाप्रद होती है। कुल मिलाकर कहूँ तो एआई के युग में माता-पिता को एक सवाल बार-बार स्वयं से पूछना चाहिए, “क्या मेरे बच्चे ने पहले स्वयं सोचने की कोशिश की है?” अगर हाँ, तो उसे एआई का उपयोग करने दीजिए। अगर नहीं, तो पहले उसे सोचने का अवसर दीजिए।


याद रखिएगा दोस्तों, हमारा लक्ष्य तकनीक के बारे में सब कुछ जानने वाले बच्चे तैयार करना नहीं है। हमें तो बच्चों को इतना विवेकवान बनाना है कि वो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, उपलब्ध जानकारी को परख सकें, जरूरत के समय सही प्रश्न पूछ सकें, लगातार सीख सकें, तकनीक को विवेक के साथ उपयोग में ला सकें और सबसे महत्वपूर्ण मानवीय संवेदनाओं को जीवन पर्यंत बनाए रख सकें। कुल मिलाकर कहूँ तो आधुनिक पैरेंटिंग का सार इतना है, “तकनीक बच्चों के हाथ में होनी चाहिए, लेकिन जीवन की दिशा उनके अपने विवेक में।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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