ईर्ष्यावश प्रतिस्पर्धा ना करें !!!
- Nirmal Bhatnagar

- Jul 10, 2022
- 3 min read
July 10, 2022
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आपने निश्चित तौर पर कभी ना कभी सामान्य सी बातचीत के दौरान सामने वाले व्यक्ति का प्रतिस्पर्धी नज़रिया देखा होगा। यह स्थिति बिलकुल ‘उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे?’ वाले विज्ञापन में दिखाई गई महिला की सोच जैसी होती है। जिसमें किसी अन्य की बेहतरीन धुली हुई साड़ी को देखकर उस महिला को एहसास होता है कि मेरी साड़ी साफ़ धुली हुई नहीं है। किसी अन्य को देखकर प्रेरित होना क़तई बुरा नहीं है, बल्कि यह तो आपको जीवन में आगे बढ़ने, उसे और बेहतर बनाने या उसे सकारात्मक रूप से जीने का मौक़ा देता है। लेकिन जब यह प्रेरणा अनावश्यक तुलना या प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेती है तो हमें नुक़सान पहुँचाने लगती है।
हाल ही में ऐसा ही कुछ अनुभव मुझे भी हुआ। जून माह से जुलाई 7 तारीख़ तक मुझे 27 अलग-अलग शहरों और विद्यालयों में शिक्षक प्रशिक्षण का कार्य करने का अवसर मिला। इस दौरान मैंने पाया कि कोरोना के बाद से शिक्षण संस्थानों की सोच में काफ़ी परिवर्तन आया है। अपनी इस धारणा की पुष्टि के लिए मैंने अपने एक मित्र, जो मेरे समान ही शिक्षक प्रशिक्षण का कार्य करते हैं, से चर्चा करने का निर्णय लिया। आपसी बातचीत के दौरान जैसे ही उन्हें पता चला कि 38 दिन में मैंने 27 ट्रेनिंग करी हैं तो वे मूल मुद्दे से भटककर, तुलना और प्रतिस्पर्धा करने में लग गए। सबसे पहले उन्होंने ज़्यादा ट्रेनिंग ना करने के उनके निर्णय व उसके बाद ज़्यादा ट्रेनिंग मुझे किस तरह का नुक़सान पहुँचाएगा, यह बताना शुरू किया। लेकिन उसके बाद उन्होंने मुझसे मेरे व्यवसायिक मॉडल, ट्रेनिंग बुक करने के तरीके पर चर्चा करना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में उनकी कथनी और करनी में अंतर साफ़ नज़र आने लगा।
मेरी नज़र में दोस्तों, प्रतिस्पर्धा करना अच्छी बात है लेकिन उसमें ईर्ष्या का भाव होना बिलकुल ग़लत है क्यूँकि जब आप ईर्ष्यावश प्रतिस्पर्धा करते हैं तो आप धन, वाणी और कर्म में संयम नहीं रख पाते हैं और संयम ना रख पाना आपसे इच्छा पूर्ति के लिए अनावश्यक और हानिकारक कार्य करवा लेता है। ईर्ष्या वश उत्पन्न प्रतिस्पर्धा आपको कभी भी संतुष्ट नहीं होने देती है और आपकी मांग या इच्छा बढ़ती जाती है। यही बढ़ती माँग या इच्छा आपसे फिर से अनावश्यक और हानिकारक कार्य करवाती है, जो बाद में आपके लिए कष्टप्रद सिद्ध होता है।
ईर्ष्यावश प्रतिस्पर्धा का एक और बड़ा नुक़सान है। यह आपको नकारात्मक भाव या ऊर्जा की वजह से ग़ुस्सैल स्वभाव का या एकदम से प्रतिक्रिया देने वाला बनाती है। याद रखिएगा, क्रोधित होना कहीं से भी ना तो हमारे लिए, ना ही दूसरों के लिए फ़ायदेमंद होता है। ग़ुस्से या क्रोध की वजह से अक्सर हम खुद को नुक़सान पहुँचाते हैं।
इसके विपरीत स्वस्थ प्रतिस्पर्धा आपको सत्य का साथ निभाते हुए खुशहाल जीवन की ओर ले जाती है। इसे मैं आपको थोड़ा विस्तार से समझाने का प्रयत्न करता हूँ। अच्छी और सच्ची प्रतिस्पर्धा केवल दिमाग़, दृढ़निश्चय और प्रण का संगम नहीं है। इसके लिए एक अच्छे उद्देश्य के साथ अच्छे मन और दिल का होना भी आवश्यक है क्यूँकि अच्छे मन और दिल में ही अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं। याद रखिएगा, धर्म और न्याय के मेल से ही अच्छे चरित्र का निर्माण होता है। जब मन से दुर्भावना या अशुद्धि दूर होती है तो वह स्वतः ही परमात्मा से जुड़ जाता है। इसीलिए कहता हूँ दोस्तों, ईर्ष्या वश प्रतिस्पर्धा में हमें अनावश्यक प्रयास करना पड़ते हैं जबकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ईश्वरीय भक्ति के सामान होती है। तो आइए दोस्तों, आज से हम ईर्ष्या वश जन्मी अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से बचते हुए, अपने जीवन को बेहतर बनाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com




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