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ईश्वर परीक्षा क्यों लेते हैं?

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 37 minutes ago
  • 3 min read

Aug 25, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अक्सर लोग बातों ही बातों में तर्क देते हैं या प्रश्न पूछते हैं, “यदि ईश्वर हर क्षण हमारे साथ हैं; हमारे आस-पास हैं तो जीवन में इतनी कठिनाइयाँ क्यों आती हैं?” ऐसी स्थिति में मेरा जवाब हमेशा एक ही रहता है, “हमें ज़्यादा मज़बूत और बेहतर बनाने के लिए।” ऐसा मैं इसलिए कहता हूँ क्योंकि मेरा मनाना है कि ईश्वर अपने भक्तों को नीचा दिखाने या गिराने के लिए तो परीक्षा लेंगे नहीं, वे तो बस अपने भक्तों को ऊंचाइयों को छूने योग्य बनाने के लिए अपने तरीक़े से सिखाते हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे आभूषण बनाने के लिए सोने को तपाना पड़ता है और मूर्ति का रूप पाने के लिए पत्थर को वार सहना पड़ता है। इसलिए ही कहा जाता है, “मनुष्य का चरित्र भी कठिन परिस्थितियों में ही निखरता है।” आइए एक किस्से से इसे समझने का प्रयास करते हैं-


गुजरात के छोटे से गाँव रतनगढ़ में दामोदर नाम का एक साधारण कुम्हार अपनी पत्नी कमला के साथ रहता था। हालाँकि उसके पास धन-संपत्ति तो बहुत कम थी, लेकिन ईमानदारी, संतोष और भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा अपार थी। उनके घर का दरवाज़ा कभी किसी जरूरतमंद के लिए बंद नहीं होता था। इसी वजह से गाँव का एक अनाथ बालक गोपाल भी उन्हें अपने माता-पिता जैसा मानता था और वे भी उसे अपने पुत्र की तरह स्नेह देते थे।


दामोदर प्रतिदिन मिट्टी के बर्तन बनाकर उन्हें बेचने बाज़ार जाता। जब भी कोई ग्राहक सामान खरीदते वक्त उससे उसकी कीमत पूछता, तो वह कहता “जितना उचित लगे, उतना दे दीजिए। विश्वास बचा रहे, यही सबसे बड़ा लाभ है।” बाजार पूर्ण कर शाम को घर लौटने पर वह अपनी पत्नी और गोपाल के साथ मंदिर में भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाता और उन्हें दिन भर के लिए धन्यवाद देता। अपनी पूरी प्रार्थना में वो भगवान से कभी कुछ माँगता नहीं था।


एक बार रतनगढ़ में वर्षा ना होने के कारण इतना सूखा पड़ा कि सारे खेत सुख गए और कुओं में पानी बेहद कम होने लगा। इसी वजह से बाजार सुनसान रहने लगा और कई लोगों की रोज़ी-रोटी छिनने लगी। दामोदर की बिक्री भी लगभग बंद हो गई। एक दिन कुम्हार को पता लगा कि गोपाल दो दिन से भूखा है। उसने अपनी पत्नी कमला से गोपाल को खाना खिलाने के लिए कहा तो उसने दामोदर को बताया कि घर में केवल एक ही समय का अनाज बचा है। इसके बाद भी दामोदर ने एक क्षण भी सोचे बिना सारा भोजन बनवा कर गोपाल के सामने रख दिया। यह देख कमला ने भी मुस्कुराकर अपना हिस्सा उसी में मिला दिया। उस रात दोनों पति-पत्नी भूखे सो गए, लेकिन उनके चेहरे पर शिकायत नहीं थी।


यह देख गांव के एक बुजुर्ग ने सोचा कि अगर एक व्यक्ति भूखा होने के बाद भी अपना भोजन दूसरे ज़रूरतमंद को दे सकता है, तो मैं सक्षम होने के बाद भी ऐसा क्यों नहीं कर सकता? विचार आते ही उसने अपने द्वार जरूरतमंदों के लिए खोल दिए। बुजुर्ग को ऐसा करता देख दूसरे व्यक्ति ने अपने कुएँ का पानी दूसरे को दिया। एक दूसरे को देख धीरे-धीरे पूरा गाँव बदलने लगा। जो लोग पहले केवल अपने परिवार की चिंता करते थे, अब पूरे गाँव को अपना परिवार मानने लगे।


कुछ ही दिनों बाद आकाश में बादल घिर आए। पहली वर्षा की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। सूखी धरती फिर हरी हो गई। कुएँ भर गए। खेत लहलहा उठे। एक दिन पूरे गाँव वालो ने जब इसका जश्न मनाया, तब गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ने कुछ ऐसा कहा कि उसे लोग आज भी याद करते हैं। उन्होंने कहा था, “बारिश आने से पहले भगवान ने बादल नहीं बदले थे... उन्होंने हमारे मन बदल दिए थे।”


दोस्तों, हम अक्सर चाहते हैं कि भगवान हमारी समस्याएँ तुरंत समाप्त कर दें। लेकिन ईश्वर चमत्कार करने से पहले यह देखते हैं कि क्या अभाव में भी हमारा चरित्र वैसा ही रहता है? क्या कठिनाइयों में भी हम ईमानदारी नहीं छोड़ते? क्या दूसरों का दुःख देखकर हमारा हृदय आज भी पिघलता है? वैसे हमारे विश्वास पर संदेह के कारण ईश्वर यह परीक्षा नहीं लेते, वे तो परीक्षा इसलिए लेते हैं ताकि हमें अपने ही चरित्र की ऊँचाई का परिचय मिल सके।


याद रखिएगा, जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तब श्रद्धा आसान होती है। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति सेवा, करुणा और विश्वास का मार्ग नहीं छोड़ता, वही वास्तव में ईश्वर की कृपा का अधिकारी बनता है। इसलिए अगली बार जब जीवन कठिन परीक्षा ले, तो यह मत पूछिए, "भगवान, मेरे साथ ही क्यों?" बल्कि यह पूछिए, "प्रभु, इस परिस्थिति के माध्यम से आप मेरे भीतर कौन-सा श्रेष्ठ मनुष्य गढ़ना चाहते हैं?" क्योंकि कई बार ईश्वर पहले हमारा चरित्र बनाते हैं, फिर हमारा भविष्य।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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