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भगवान चढ़ावा नहीं, भावना स्वीकार करते हैं!!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 3 hours ago
  • 3 min read

Aug 24, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, मैंने अपने जीवन में दो तरह के दान-दाताओं को देखा है। पहले वो जिनके दान को दुनिया देखती है और दूसरे वो जिनके दान को ईश्वर देखते हैं। जिस दान को दुनिया देखती है, वो प्रसिद्धि दिलाता है और जिस दान को ईश्वर देखते हैं, वो आत्मा को समृद्ध करता है। चलिए, जगन्नाथ मंदिर से जुड़े एक किस्से से इसे समझने का प्रयास करते हैं-


बात कई साल पुरानी है, जगन्नाथ मंदिर से कुछ दूरी पर मिट्टी की एक झोपड़ी में मालती नाम की एक बहुत ही गरीब और अनाथ लड़की रहती थी। जो छोटे-मोटे कार्य करके किसी तरह अपना जीवन चलाया करती थी। पूंजी के नाम पर उसके पास एक छोटा सा गुलाब के फूल का पौधा था, जिसे उसकी दिवंगत माँ ने लगाया था। अपने दिन की शुरुआत वो हमेशा उस पौधे को पानी देकर; उससे बातें कर, किया करती थी। जब भी उस पौधे में फूल खिला करता था वो तुरंत उसे भगवान जगन्नाथ के मंदिर के द्वार पर अर्पित करते हुए, धीरे से कहती, “प्रभु, मेरे पास चढ़ाने के लिए बस यही एक फूल है। यदि मेरा प्रेम सच्चा हो, तो इसे स्वीकार कर लीजिए।” असल में उस समय में जाति प्रथा के कारण उसके समाज को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश का अधिकार नहीं था।


एक दिन उस समय का मशहूर व्यापारी सेठ धनराज सोने से बना भव्य पुष्पहार लेकर भगवान जगन्नाथ के मंदिर आया और पुजारी से बोला, “पंडित जी, मेरे अनुसार इतना बड़ा दान पूरे राज्य में किसी ने नहीं दिया होगा। इसलिए मंदिर के मुख्य द्वार पर मेरा नाम लिखा जाए।” पंडित जी ने मुस्कुरा कर सेठ का प्रस्ताव स्वीकार लिया। इसके कुछ माह बाद वहाँ इतना भयंकर सूखा पड़ा कि लोगों को पीने का पानी कम पड़ने लगा और उस इलाक़े के सारे फूल-पौधे सूखने लगे। जिसे देख सेठ ने एक बार फिर गाँव में अपने नाम से भंडारे की व्यवस्था की। गाँव वालो ने भी अच्छी बारिश की कामना के साथ कई पूजा-पाठ और टोने-टोटके किए। जबकि मालती किसी तरह गाँव के पेड़-पौधों के साथ अपने गुलाब के पौधे को थोड़ा बहुत पानी देकर बचाने लगी। उसके मन में सिर्फ़ यह भाव था कि प्रभु को चढ़ाने के लिए फूलों की कमी नहीं होना चाहिए।


बारिश के बाद गाँववासियों ने भगवान जगन्नाथ के भक्तों का सम्मान मुख्य पंडित द्वारा कराने का निर्णय लिया और उस कार्यक्रम में पूरे गाँव सहित सेठ और मालती को भी आमंत्रित किया। कार्यक्रम के दौरान पंडित जी ने सबसे पहले मालती का सम्मान किया और फिर सेठ का, जिसे देख सेठ नाराज होते हुए पंडित जी से बोले, “पंडित जी सबसे पहले मेरा सम्मान क्यों नहीं किया गया।” पंडित जी हल्की मुस्कुराहट के साथ बोले, “सेठ जी, सोना आपने अपनी संपत्ति से दिया है, लेकिन बच्ची ने अपनी आवश्यकता त्यागकर भगवान को फूल अर्पण किए। इतना ही नहीं सोना अर्पण करते वक्त आपके मन में नाम की इच्छा थी और जहाँ दान के साथ नाम की इच्छा जुड़ जाए, वहाँ भक्ति कहीं पीछे छूट जाती है।”


एक क्षण की खामोशी के बाद पंडित जी अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोले, “सेठ जी, भगवान वस्तु का मूल्य नहीं, त्याग और भावना का मूल्य देखते हैं। इसलिए सच्ची भेंटों का मूल्य नहीं, उसके पीछे हृदय में उपजी भावना को देखा जाता है। इस बात का एहसास मुझे मालती का दिया फूल ईश्वर को अर्पण करते वक्त हुआ। उस छोटे से फूल को हाथ में लेते ही मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति उतर आई थी। तब मैंने पहली बार महसूस किया कि कुछ भेंटें हाथों से नहीं, हृदय से उठती हैं।” पंडित जी की बात को सुन सेठ धनराज को समझ आ गया कि वे भगवान को प्रसन्न करने नहीं, लोगों को प्रभावित करने आए थे। वे धीरे-धीरे मालती के पास पहुँचे और बोले, “बेटी, आज तुमने मुझे दान का वास्तविक अर्थ सिखा दिया।”


दोस्तों, इस कहानी का सबसे बड़ा चमत्कार मंदिर की घंटियाँ नहीं बल्कि अहंकारी मन का विनम्र हो जाना है। इसलिए ही कहते हैं, जिसके पास प्रेम है, उसका एक फूल भी अनमोल है; और जिसके मन में अहंकार है, उसका सोना भी हल्का पड़ जाता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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