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उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना है तो विज़न बनाएँ !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Dec 31, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

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दोस्तों, आज याने वर्ष 2025 के अंतिम दिन हममें से ज्यादातर लोग अपने पूरे वर्ष को इवैल्यूएट करने के साथ-साथ वर्ष 2026 को प्लान करने के विषय में भी सोच रहे होंगे क्योंकि आज की दुनिया में हर व्यक्ति लक्ष्य याने गोल की बात करता है, उसके अनुसार जीता है। याने आज हममें से कई अगले 5 वर्षों के लक्ष्य, उसे पाने का 5 वर्षों का प्लान, उस प्लान या योजना के हिसाब से 1 साल का टारगेट, अगले तीन माह के लक्ष्य आदि बना रहे होंगे, जो ग़लत भी नहीं है। लेकिन समय के साथ मैंने सीखा है कि केवल लक्ष्य या गोल आधारित जीना, जीवन को छोटा बना देता है। इसलिए महान, सुखी या अत्यधिक सफल लोग लक्ष्य या गोल आधारित जीवन जीने के स्थान पर पूरे जीवन का विज़न बनाते हैं, जो उनके जीवन की दिशा तय करता है। आइए, इसी बात को हम कुछ बिंदुओं में समझते हैं-


1. लक्ष्य या गोल सीमित होते है, विज़न असीमित

दोस्तों, लक्ष्य या गोल का दायरा छोटा होता है। लक्ष्य कहता है, “इतने पैसे कमाने हैं”, “यह पद पाना है”, “यह घर खरीदना है” लेकिन विज़न पूछता है, “मैं यह सब क्यों पाना चाहता हूँ?” याने विज़न लक्ष्य से आगे जाकर अर्थ खोजता है। इसी तरह लक्ष्य पूरा होते ही समाप्त हो जाता है, लेकिन विज़न पूरा होने के बाद भी नई राहें खोलता रहता है।


2. लक्ष्य या गोल बाहरी संसाधनों पर टिके होते हैं, विज़न भीतर की शक्ति जगाता है

दोस्तों, लक्ष्य देखता है कि आपकी क्षमताएं क्या है?, आप कितने साधन संपन्न हैं? आपके पास कितना समय है?, आदि।
इसके विपरीत विज़न देखता है कि आपके भीतर कौन-कौन सी छिपी हुई शक्ति और क्षमताएं हैं? आपके जीवन का मकसद क्या है, आप किसके लिए बने हैं? आप इस दुनिया को किस तरह बेहतर बना सकते हैं? कैसे दर्द कम कर सकते हैं? आदि। इस आधार पर कहा जाए तो लक्ष्य विपरीत परिस्थितियों में छूट सकता है, हमारे भीतर डर पैदा कर सकता है। विज़न हमें परिस्थितियों से डरने के स्थान पर उन्हें बदलने का साहस देता है।


3. लक्ष्य या गोल लेने की भाषा बोलता है, विज़न देने की

लक्ष्य आधारित जीवन जीने वाला प्रश्न करता हैं कि “मुझे क्या मिलेगा?” विज़न आधारित जीवन जीने वाले का प्रश्न होगा, “मेरे होने से दुनिया को क्या मिलेगा?” जब सोच “पाने” से “देने” की ओर जाती है, तो व्यक्ति साधारण से असाधारण बन जाता है। इसीलिए विज़नरी लोग सिर्फ सफल ही नहीं होते, वे उपयोगी भी होते हैं।


4. लक्ष्य या गोल समय के साथ खत्म हो जाते हैं, विज़न पीढ़ियों तक चलता है

एक लक्ष्य साल, दो साल, पाँच साल में पूरा हो सकता है। एक टारगेट पूरा होते ही दूसरा टारगेट शुरू हो जाता है। लेकिन विज़न ऐसा बीज है, जो दशकों तक फल देता है। आचार्य चाणक्य ने यह नहीं सोचा था कि “बस तक्षशिला में पढ़ाना है।” उनका विज़न था, एक मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध भारत बनाना। इसी विज़न ने चंद्रगुप्त मौर्य को जन्म दिया, और एक युग रच दिया।


5. विज़न के बिना गोल सिर्फ दौड़ बन जाता है

दोस्तों, आज बहुत से लोग लक्ष्य पर लक्ष्य पूरे कर रहे हैं, लेकिन उसके बाद भी ख़ुश नहीं रह पा रहे हैं। उनके भीतर तमाम उपलब्धियों के बाद भी खालीपन है। जानते हैं क्यों? क्योंकि उन्होंने कभी ख़ुद से पूछा ही नहीं कि वे ये सब कर क्यों रहे हैं। जब इंसान के पास विज़न नहीं होता है तब सफलता भी थकान बन जाती है और अगर विज़न होता है तो संघर्ष भी अर्थपूर्ण लगता है।


इसलिए दोस्तों, आज, वर्ष के अंतिम दिन लक्ष्य के स्थान पर विज़न बनाइये, उसके अनुसार चलिए आप पायेंगे कि जीवन खुद आकार लेने लगेगा। विज़न बनाने के लिए आप खुद से कुछ सवाल करें-

1) मैं किस तरह का जीवन जीना चाहता हूँ?

2) मुझे अपने जीवन में कौन से दर्द को कम करना है?

3) मैं किस तरह दूसरों के जीवन को बेहतर बना सकता हूँ?

4) मैं किस मूल्य के साथ जीवन जीना चाहता हूँ?

5) मैं दुनिया में किस तरह की पहचान छोड़ना चाहता हूँ?

दोस्तों, ये सभी सवाल आपको एक अच्छा विज़न बनाने के लिए नींव का काम करेंगे और यह विज़न समय के साथ-साथ अपने आप ही लक्ष्य याने गोल बन जाएँगे।


याद रखियेगा दोस्तों, लक्ष्य याने गोल आपको व्यस्त रखता है, जबकि विज़न आपको प्रासंगिक बनाता है। लक्ष्य याने गोल आपको सफल बनाता है, जबकि विज़न आपको महान बनाता है। इसलिए आज से अपनी सोच को बदलिए और लक्ष्य के स्थान पर जीवन को सही दिशा देने वाले विज़न पर काम कीजिए क्योंकि जब वो स्पष्ट होता है तब जीवन उद्देश्यपूर्ण बन जाता है और रास्ते अपने आप ख़ुद बनते जाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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