सीखें, खुद से बात करने की कला…
- Nirmal Bhatnagar

- 3 days ago
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Dec 30, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हर दिन हम किसी ओर से ज़्यादा या यूँ कहूँ सबसे ज़्यादा ख़ुद से बातें करते हैं। अक्सर यह बात बिना आवाज़ के मन के भीतर चलती और यही तय करती है कि हम जीवन में आगे बढ़ेंगे या पीछे रहेंगे; मजबूत बनेंगे या फिर टूटेंगे। जी हाँ, हमारा भविष्य इस बात से तय होता है कि हम किस लहजे में ख़ुद से बात करते हैं। अगर यह बातचीत डर, आलोचना और पुराने अनुभवों से भरी होती है तो अक्सर “मुझसे नहीं होगा…”, “मैं दबाव में फेल हो जाऊँगा…”, “अगर आज भी गलत हो गया तो?” जैसे विचार इंसान के मन में आने लगते हैं। सोच कर देखियेगा, अगर हम यही शब्द याने “तुमसे नहीं होगा…”, “तुम दबाव में फेल हो जाओगे…” या “अगर तुमने आज भी ग़लत कर दिया तो?” आदि कहा तो सामने वाला कैसी प्रतिक्रिया देगा? मेरी नजर में उसकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी होगी कि शायद हमें माफ़ी माँगना पड़ जाएगी। लेकिन दोस्तों, हम खुद से ऐसा व्यवहार रोज़ करते हैं।
इसलिए मेरा मानना है कि मन से सही ढंग से बात करना भी साधना है। ज़्यादातर लोग अपने भीतर अपने श्रेष्ठ या दिव्य पक्ष से बात नहीं करते, बल्कि अपने डर और असुरक्षा से बात करते हैं। अतीत की गलतियाँ और भविष्य की चिंताएँ अच्छी बातचीत नहीं बनातीं। खुद से सही ढंग से बात करना एक गहरा मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है। यही अभ्यास मन को दुश्मन से मित्र बना देता है।
उदाहरण के लिए सचिन तेंदुलकर को ही ले लीजिए। आज उन्हें हम सिर्फ़ रिकॉर्ड्स के लिए नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती के लिए भी जानते है। अपने करियर की पहली सिरीज़ के शुरुआती दौर में सचिन कई बार असफल हुए। शुरुआती दौर और बड़ी उम्मीद के दबाव के बावजूद भी उन्होंने कभी अपने मन को यह नहीं कहने नहीं दिया कि “तू नाकाम है।” उन्होंने सबसे पहले ख़ुद से कहा कि “मैंने अभ्यास किया है।”, “मेरा काम प्रक्रिया पर टिके रहना है, नतीजे पर नहीं। इसलिए अगले मैच में मैं रन बनाने के स्थान पर ३० मिनिट टिके रहने पर फोकस करूँगा।” दोस्तों, अतीत या भविष्य पर ध्यान देने के स्थान पर अगली गेंद पर ध्यान देने की अंदरूनी बातचीत उन्हें वर्तमान में टिकाए रखती थी। एक गेंद, एक शॉट, एक क्षण - बस वहीं रहना। अगर सचिन हर आउट होने के बाद अपने मन को कोसते रहते, तो ना 100 शतक बनते, ना ही इतिहास रचता।
याद रखियेगा, मन एक बच्चे की तरह होता है, वह डाँटने से शांत नहीं होता। जैसे एक बच्चे को शांत बैठाने के लिए माँ ज़बरदस्ती करने के स्थान पर उसे प्यार से समझाती है, ठीक वैसे ही अपने मन को विपरीत परिस्थिति में शांत रखने के लिए समझाइए कि “गलती हो सकती है। अभी तू सीख रहा है।” या “अभी बस इस पल पर ध्यान दे।” जब आप प्रेम से मन को सिखाते हैं, तो वह सहयोगी बन जाता है।
दोस्तों, वर्तमान में रहना ही सही संवाद है, यही सचिन की सबसे बड़ी ताकत थी। वे पिछली गेंद को भूल जाते थे और अगली गेंद के लिए तैयार रहते थे क्योंकि वे जानते थे कि अतीत अपराध-बोध देता है और भविष्य डर, लेकिन वर्तमान, हमेशा समाधान देता है। इसलिए कहते हैं, “अच्छी बातचीत हमेशा ‘अभी’ में होती है।” जिस दिन आप अपने मन से लड़ना छोड़कर, उसे समझना शुरू करते हैं, उसी दिन आप भीतर से मजबूत हो जाते हैं।
याद रखिए, आपका मन ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी बाधा भी। अगर आप सचिन की तरह उससे प्रेम, मार्गदर्शन और विश्वास के साथ बात करेंगे तो वो आपका मित्र बन जाएगा। इसलिए लक्ष्य के स्थान पर प्रक्रिया पर ध्यान दीजिए, खुद से सम्मान से बात कीजिए, हर पल को नया अवसर मानिए, अपने मन से प्रेम कीजिए, खुद को समझाइए और खुश रहना सीखिए क्योंकि जब भीतर की बातचीत सुधरती है, तो बाहर का पूरा खेल बदल जाता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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