करें हील ख़ुद को…
- Nirmal Bhatnagar

- 7 hours ago
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Apr 20, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन हमेशा एक जैसा नहीं चलता, कभी हमें यह दिल की गहराइयों तक सुख, शांति और संतुष्टि का एहसास करवाता है तो कई बार कुछ ऐसे अनुभव देता है, जो भीतर तक चोट पहुँचाता है। दिल तोड़ने वाले ये अनुभव हमें कभी किसी अपने के व्यवहार से मिले हैं, तो कभी किसी असफलता से, तो कभी विश्वास टूटने की वजह से। दिल पर खाये ये घाव वैसे तो दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ धीमे-धीमे ये हमारे सोचने, बोलने और व्यवहार करने के तरीके को बदल देते हैं और अगर समय रहते इन घावों पर ध्यान ना दिया जाए, तो ये दर्द अनजाने में उन लोगों तक पहुँचने लगता है, जिनका उस दर्द से कोई संबंध नहीं होता। यही कारण है कि कई बार हम बिना वजह चिड़चिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं या फिर परेशान होने लगते हैं।
दोस्तों, ईश्वर के बनाए इस जीवन की अनूठी सच्चाई तो यह है कि परेशानी का एहसास करवाने वाले अनुभव असल में हमें कुछ सिखाने के लिए आते हैं। हर असहज स्थिति हमें इस बात का एहसास करवाती है कि अभी भी हमारे अंदर कुछ ऐसा बचा हुआ है, जिसे समझने और ठीक करने की जरूरत है। लेकिन अकसर हम ईश्वर के बनाए इन संकेतों को समझने के स्थान पर, प्रतिक्रिया देने लगते हैं और अगर लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे तो यह हमारे रिश्तों को प्रभावित करने लगती है।
आइए, इस बात को हम महान भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली के उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। विराट को क्रिकेट की दुनिया में आज के सबसे सफल और आक्रामक खिलाड़ियों में से एक माना जाता है। लेकिन अगर आप उनके करियर के शुरुआती दिनों को देखेंगे तो पायेंगे कि उनका स्वभाव बहुत जल्दी प्रतिक्रिया देने वाला था। उन्हें मैदान पर छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था, विरोधी खिलाड़ियों से उनकी बहस हो जाती थी। लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को समझा। उन्होंने महसूस किया कि यह गुस्सा उनकी ऊर्जा को सही दिशा में नहीं ले जा रहा। धीरे-धीरे उन्होंने अपने भीतर काम किया, धैर्य और भावनाओं को नियंत्रित करना सीखा। जिसकी वजह से आज वे अपनी आक्रामकता को एक सकारात्मक ऊर्जा में बदल चुके है। दोस्तों, यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। इसके लिए उन्होंने ख़ुद के भीतर झांका और भीतर के घावों को समझा; उन्हें ठीक किया और ख़ुद को बदला।
दोस्तों, हम सभी के भीतर कोई ना कोई ऐसा नकारात्मक अनुभव होता है जो हमें भीतर से ट्रिगर करता है। ऐसी विषम स्थितियों में सबसे ज्यादा यह मायने रखता है कि आप उससे सीख कर, बेहतर बन रहे हैं या परेशान होकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अगर आप हर बार प्रतिक्रिया देंगे, तो आप उसी दर्द को आगे बढ़ाते रहेंगे। लेकिन अगर एक पल रुककर समझेंगे और ख़ुद से प्रश्न करेंगे कि, “मुझे यह क्यों परेशान कर रहा है?” तो अपने भीतर एक नई समझ विकसित करेंगे।
याद रखिएगा, धैर्य, जन्म से नहीं आता, वह हर परेशानी में सीखने के नज़रिए से विकसित होता है और इसी तरह भीतर के घावों का भरना कोई एक घटना नहीं, प्रक्रिया है। जिसमें हम अपने दर्द को स्वीकार करते हैं, समझते हैं, और धीरे-धीरे उसे जाने देते हैं। याद रखिएगा, जीवन में सच्ची शांति तब आती है, जब हम अपने भीतर के घावों को भरना सीख जाते हैं क्योंकि जो व्यक्ति भीतर से शांत होता है, वह बाहर भी शांति फैलाता है। इसलिए दोस्तों, आज से एक छोटा सा संकल्प लें और तय कर लें कि अब आप प्रतिक्रिया देने से पहले स्थिति को समझने की कोशिश करेंगे और अपने दर्द को दूसरों तक नहीं पहुँचने देंगे। साथ ही अब आप हर परेशानी को एक सीख के रूप में स्वीकार करेंगे क्योंकि अब आप जानते हैं कि जब हम खुद को हील करते हैं, तब हम सिर्फ अपना जीवन नहीं बदलते, बल्कि अपने रिश्तों को भी बेहतर बनाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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