क्या आप पूरी तस्वीर देख रहे है !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 1 day ago
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July 4, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, इस आधुनिक दौर में रिश्ते किसी बड़ी वजह से कम, छोटी-छोटी बातों से ज़्यादा टूट रहे हैं। आज ज्यादातर परिवारों में तनाव है, कार्यालयों में टकराव है, समाज में मतभेद हैं और सोशल मीडिया पर तो जैसे हर व्यक्ति अपनी बात को अंतिम सत्य साबित करने में लगा है। इस बात में भी समस्या यह नहीं कि लोगों की राय अलग है। मुख्य समस्या तो यह है कि हमने अपने से अलग मत रखने वाली रायों को गलत राय मानना शुरू कर दिया है। आइए इस बात को हम एक छोटी सी कहानी से समझने का प्रयास करते हैं-
रोज़ की तरह विद्यालय में कक्षाएँ लग रही थी। इन्हीं कक्षाओं में से एक कक्षा में पढ़ाई के दौरान अचानक दो छात्र आपस में बहस करने लगे। एक कह रहा था, “मेरी बात सही है।” तो दूसरा कह रहा था, “तुम बिल्कुल गलत हो।” दोनों ही छात्र एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। कुछ देर तक सुनने के बाद अध्यापक ने दोनों छात्रों को अपने पास बुलाया और एक छात्र को अपनी टेबल के दायीं तरफ़ और दूसरे को बाईं तरफ़ खड़े रहने को कहा। इसके पश्चात उन्होंने अपनी मेज पर दो रंगों वाली एक गेंद रखी।
इसके पश्चात अध्यापक ने एक छात्र से पूछा, “बताओ, गेंद का रंग क्या है?” पहले छात्र ने तपाक से कहा, “सफेद।” उसका उत्तर सुनते ही दूसरा छात्र एकदम से बोला, “नहीं, गेंद काली है।” दोनों ही छात्र एक बार फिर बहस करने लगे; एक दूसरे को ग़लत ठहराने लगे। तभी अध्यापक ने एकदम से दोनों की जगह बदलवा दी। याने जो छात्र दायीं और खड़ा था वह अब बाईं ओर था और बाईं ओर वाला दायीं ओर। जिसकी वजह से जो छात्र पहले सफेद देख रहा था, उसे गेंद काली दिखाई देने लगी और जिसे काली दिखाई दे रही थी, उसे अब सफेद। दोनों ही छात्र गेंद का बदला हुआ रंग देख हैरान थे और इसी वजह से कुछ कह नहीं पा रहे थे। तभी अध्यापक ने मुस्कुराते हुए बोला, “बच्चों तुम दोनों ही गलत नहीं थे। बस तुम दोनों अधूरे सत्य को देख धारणा बना रहे थे।”
दोस्तों, जीवन की सबसे बड़ी समस्या ही यही है। हम अक्सर अधूरे सत्य को पूरा सत्य मान लेते हैं। हर व्यक्ति अपने अनुभवों, परिस्थितियों, संस्कारों और सोच के आधार पर दुनिया को देखता है। इसीलिए जो बात आपको सही लगती है, संभव है किसी दूसरे को उसके अनुभवों के आधार पर वह गलत लग रही हो। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सामने वाला मूर्ख है। इसका अर्थ केवल इतना है कि उसका उस बात को देखने का नजरिया अलग है। जी हाँ, यही वो कारण है जिसकी वजह से एक ही घटना पर दो लोग बिल्कुल अलग प्रतिक्रिया देते हैं। एक व्यक्ति चुनौती में अवसर देखता है, दूसरा उसी में संकट। एक असफलता को सीख मानता है, दूसरा उसे अंत समझ लेता है। परिस्थिति वही रहती है, बदलता केवल नज़रिया है। आज रिश्ते इसलिए नहीं टूट रहे कि लोग बुरे हो गए हैं। बल्कि रिश्ते इसलिए टूट रहे हैं क्योंकि लोग सुनना छोड़ चुके हैं। वे समझने से पहले निर्णय दे देते हैं। वे प्रश्न पूछने से पहले निष्कर्ष निकाल लेते हैं। दोस्तों, जब संवाद समाप्त हो जाता है, तब विवाद जन्म लेता है। इसलिए अपनी राय देने से पहले सामने वाले का दृष्टिकोण समझने की आदत विकसित कर लें। ऐसा करते ही जीवन की आधी समस्याएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। इसलिए ही कहा गया है, “परिपक्व व्यक्ति वह नहीं होता जो हर बहस जीत जाए। परिपक्व व्यक्ति वह होता है जो समझ जाए कि हर सत्य के कई पहलू हो सकते हैं।”
दोस्तों, अगली बार जब कोई आपकी बात से असहमत हो, तो तुरंत उसे गलत साबित करने से पहले स्वयं से पूछिएगा, “क्या मैं पूरी तस्वीर देख रहा हूँ, या केवल अपना हिस्सा?” क्योंकि हो सकता है, जिस सत्य को आप गलत समझ रहे हों, वह केवल किसी दूसरे कोण से दिखाई देने वाला सत्य हो। याद रखियेगा, जब हम नज़रिया बदलना सीख जाते हैं, तब विवाद अपने आप संवाद में बदल जाता है और दूसरी बात, मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मनभेद होना हमारी पसंद है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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