जीवन में सफलता का पैमाना अंक नहीं होते…
- Nirmal Bhatnagar

- 15 hours ago
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July 5, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, स्कूल और स्कूल के दोस्तों याने सहपाठियों की बात ही कुछ अलग होती है। वे केवल हमारे साथ पढ़ने वाले बच्चे नहीं होते, बल्कि हमारे जीवन के पहले ऐसे साथी होते हैं, जो हार-जीत, सुख-दुख, अच्छे-बुरे दौर में हमारा साथ देते हैं। ये सभी बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं। याने एक जैसी यूनिफार्म पहन, एक जैसी प्रार्थना और एक जैसे सपनों के साथ, एक जैसी बेंच पर बैठ अपने दिन की शुरुआत करते हैं। उस दौर में हमें ना तो किसी का बैंक बैलेंस दिखाई देता है और ना ही परिवार की हैसियत। इस समय तो बस हम मान कर चलते हैं कि जीवन भी परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका की तरह होगा। जो सबसे अधिक अंक लाएगा, वही सबसे अधिक सफल होगा। जो आज पीछे है, वह हमेशा पीछे ही रहेगा। मेहनत का सीधा-सीधा परिणाम सफलता होगा। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, जीवन हमें एक अलग पाठ पढ़ाता है।
इस बात का एहसास हमें अक्सर बीस-पच्चीस वर्षों बाद उस वक्त होता है जब स्कूल रीयूनियन, शादी, हवाई अड्डे या किसी संयोगवश मुलाकात में पुराने सहपाठी मिलते हैं और हमारे सामने जीवन का सबसे रोचक अध्याय खुलता है। हमें पता चलता है कि कक्षा का सबसे शरारती छात्र, सफल उद्यमी बन चुका होता है। जो हमेशा चुप रहता था, वह सैकड़ों लोगों का नेतृत्व कर रहा होता है। परीक्षा में अव्वल आने वाला, संघर्ष करता दिखता है और जो कभी साधारण माना जाता था, वही असाधारण जीवन जी रहा होता है। ऐसे में मन में सहज ही प्रश्न उठता है, “आख़िर ऐसा कैसे हुआ?”
दोस्तों, उत्तर सरल भी है और गहरा भी। स्कूल में सफलता का पैमाना अंक होते हैं, लेकिन जीवन में सफलता का पैमाना बहुत व्यापक होता है। यहाँ ज्ञान के साथ धैर्य भी चाहिए। मेहनत के साथ सही निर्णय भी चाहिए। प्रतिभा के साथ संबंध भी चाहिए। ईमानदारी के साथ अवसर भी चाहिए और सबसे बढ़कर, परिस्थितियों के बदलने पर स्वयं को बदलने की क्षमता भी चाहिए। जीवन केवल यह नहीं देखता कि आप कितने बुद्धिमान हैं; वह यह भी देखता है कि कठिन समय में आप कितने मजबूत रहते हैं, असफलता के बाद कितनी जल्दी उठते हैं और सफलता मिलने पर कितने विनम्र बने रहते हैं।
लेकिन दोस्तों, सहपाठियों के साथ अचानक ही हुई ऐसी मुलाकातों ने मेरा परिचय जीवन के एक महत्वपूर्ण और सुंदर पहलू से कराया। जब पुराने सहपाठी मिलते हैं, तब किसी के पद का महत्व नहीं रह जाता। कोई डॉक्टर हो, उद्योगपति हो, वैज्ञानिक हो, शिक्षक हो या सरकारी अधिकारी—कुछ ही क्षणों में सब फिर से वही पुराने विद्यार्थी बन जाते हैं। पुरानी शरारतों पर हँसी आती है। कक्षा की घटनाएँ याद आती हैं। शिक्षकों की डाँट भी मुस्कान बन जाती है। उस समय न वेतन बोलता है, न पद। बोलती है केवल आत्मीयता। शायद यही रिश्तों की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है।
दोस्तों, इसलिए कभी भी किसी से तुलना मत कीजिए। हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। हर किसी का समय अलग होता है। किसी को सफलता जल्दी मिलती है, किसी को देर से; लेकिन यदि चरित्र, सीखने की इच्छा और कर्मनिष्ठा बनी रहे, तो जीवन हर किसी को आगे बढ़ने का अवसर अवश्य देता है।
दोस्तों, अंत में बस इतना कहूँगा, स्कूल हमें पढ़ना सिखाता है, लेकिन जीवन हमें समझना सिखाता है। हमें एहसास करवाता है कि जीवन की सबसे बड़ी सफलता केवल ऊँचा पद या बड़ा बैंक बैलेंस नहीं बल्कि वो स्थिति है जब वर्षों बाद मिले सहपाठी या दोस्त को आपकी उपलब्धियों से पहले इंसानियत याद आए क्योंकि अंत में केवल यह याद रखा जाता है कि आपने रिश्ते कितने दिल से निभाए।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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