खुद को बदलना हमेशा हमारे हाथ में होता है…
- Nirmal Bhatnagar

- 3 days ago
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Feb 10, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हममें से ज्यादातर लोग मन ही मन मानकर चलते हैं, “मैं सही हूँ और सारी समस्या दूसरों में है।” जबकि हमेशा यह सही नहीं होता है। मेरी नजर में यह सोच ठीक वैसी ही है, जैसे अपने चेहरे पर लगी गंदगी को साफ़ करने के बजाय उस आईने को साफ़ करना जो चेहरे की गंदगी को दिखा रहा है। आईना दोषी नहीं होता, वह तो सिर्फ़ सच दिखाता है। लेकिन हम सच देखने की जगह आईने से ही नाराज़ हो जाते हैं।
हम रोज़ कहते हैं, “फ़लाँ इंसान ऐसा है, फ़लाँ वैसा है”, “मेरे साथ सब गलत करते हैं, दुनिया सुधर जाए तो सब ठीक हो जाए।” लेकिन कभी रुककर ख़ुद से यह नहीं पूछते, “क्या मुझमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं?” सच तो यह है दोस्तों, दुनिया बदलने से पहले खुद को बदलना ज्यादा जरूरी होता है, जिसका साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। लेकिन अगर इस साहस को जुटा लिया जाये, तो अपनी असीम क्षमताओं को खोजा जा सकता है।
दलाई लामा ने इस सत्य को अपने जीवन में गहराई से जिया है। उन्हें निर्वासन मिला, उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा, अन्याय झेलना पड़ा। वे चाहते तो जीवन भर इसके लिए दूसरों को दोष देते रह सकते थे। याने वे राजनीति को, सत्ता को, दुनिया को आसानी से दोष दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं। उन्होंने तो बस ख़ुद से कहा, “अगर मैं शांति चाहता हूँ, तो मुझे स्वयं शांत होना होगा।” उन्होंने बाहरी दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर की प्रतिक्रिया बदली। क्रोध की जगह करुणा चुनी, प्रतिशोध की जगह समझ को चुना और इसीलिए आज पूरी दुनिया उन्हें शांति का प्रतीक मानती है।
दोस्तों, जब हम यह मान लेते हैं कि “मैं बिल्कुल सही हूँ,” तो सीखने के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं क्योंकि जो व्यक्ति खुद को पूर्ण मान लेता है, वह आगे बढ़ना बंद कर देता है और जो व्यक्ति अपनी गलतियों को देखने का साहस करता है, वही वास्तव में बड़ा बनता है।
रिश्तों के विषय में भी यह बात उतनी ही सही है। अगर आपको लगता है कि हर रिश्ते में आप ही सही हैं और सामने वाला गलत, तो शायद समस्या रिश्तों में नहीं, हमारी दृष्टि में है। इसी तरह अगर आपको लगता है कि अक्सर हर जगह, लोग आपको समझ नहीं पाते है, तो संभव है कि आपको खुद को और स्पष्ट करना सीखना होगा।
दोस्तों, अगर आप अपनी पूर्ण क्षमता को खोज कर इस जीवन को बेहतरीन तरीके से जीना चाहते हैं, तो आज से एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए। जब अगली बार मन कहे, “सामने वाले ने गलत किया,” तो एक पल रुककर ख़ुद से पूछिएगा, “यहाँ मैं और क्या बेहतर कर सकता था?” यह प्रश्न आपको कमजोर नहीं, बल्कि भीतर से मजबूत बनाएगा।
याद रखिएगा दोस्तों, दूसरों को बदलना हमारे वश में नहीं है, लेकिन खुद को बदलना हमेशा हमारे हाथ में होता है और सबसे सुंदर बात यह है, जब आप खुद में बदलाव लाते हैं, तो बिना कुछ कहे आपके आसपास का माहौल भी बदलने लगता है क्योंकि लोग आपके शब्दों से नहीं, आपके व्यवहार से सीखते हैं।
दोस्तों, इसलिए आज संकल्प लें, हम आईने को साफ़ करने की ज़िद छोड़ेंगे, और अपने चेहरे की सफ़ाई शुरू करेंगे। हम दूसरों की गलतियाँ गिनने से पहले खुद को देखने का साहस करेंगे क्योंकि जो खुद को सुधार लेता है, वही दुनिया को सुधारने की दिशा में पहला सच्चा कदम उठाता है। यही असली परिपक्वता है और सच्ची बुद्धिमानी है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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