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गुस्सा करने से पहले ‘छंगा’ को याद कर लें…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 2
  • 4 min read

June 2, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, हम सभी के जीवन में कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो छोटी-सी गलती पर ऐसे नाराज़ होता है, जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी गलती पर टिकी हो। चाय में चीनी कम हो जाए तो गुस्सा। मोबाइल देर से उठाओ तो गुस्सा। फाइल गलत जगह रख दो तो गुस्सा। और तो और यदि किसी ने उनकी बात का अर्थ शाब्दिक रूप से समझ लिया, तो फिर तो मानो प्रलय आ गई! चलिए, एक मजेदार राजस्थानी लोककथा से इसे समझते है-


राजस्थान के एक गांव में एक गुस्सैल साहूकार रहता था। उसके स्वभाव से ऐसा लगता था मानो उसके शरीर में खून से ज्यादा गुस्सा बहता था। उसके पास छंगा नाम का एक सीधा-सादा, मेहनती, लेकिन बातों को थोड़ा शाब्दिक अर्थ में समझने वाला नौकर था। एक दिन साहूकार ने नई मोजड़ी में तेल लगाने का कहा। सामान्य से कम बुद्धि वाला ‘छंगा’ समझ नहीं पाया कि मोजड़ी को चमकाने के लिए थोड़ा तेल लगाना है। उसने मालिक के काम को पूरी ईमानदारी से करने के उद्देश्य से मोजड़ी को तेल के कनस्तर में डुबो दिया! कुछ देर बाद जब साहूकार ने मोजड़ी के बारे में पूछा, तो छंगा बोला, “मालिक, तेल के कनस्तर के अंदर सुरक्षित रखी है।” इतना सुनते ही साहूकार का गुस्सा और रक्तचाप बढ़ गया और उन्होंने छंगा की धुलाई कर दी। इसके कुछ दिनों बाद जब साहूकार अपनी बीवी को लेने के लिए ससुराल जा रहा था तब भी एक गलती के लिए उसने छंगा के साथ इसी तरह का व्यवहार किया। जिसे देख छंगा ने बदला लेने का निर्णय लिया।


ससुराल जाते वक्त जब सेठ रास्ते में सुस्ताने लगा तब, छंगा ने सेठ के कपड़े, गहने लिए और उन्हें पहन कर सेठ की ससुराल पहुँच गया और कहने लगा कि सेठ पागल हो गए हैं और इस वक्त जंगल में पेड़ के नीचे सो रहे है। छंगा की बात सुन ससुर जी दौड़े-दौड़े जंगल पहुँचे और कच्छे-बनियान में साहूकार को पेड़ के नीचे बैठा देख चौंक गए। साहूकार भी ससुराल वालों को सामने देख हड़बड़ा गया। उसने चारों ओर बड़े ध्यान से देखा लेकिन आभूषण, कपड़े और छंगा को ना पा पागल सा हो गया।


सास-ससुर बड़े दुखी मन से साहूकार को अपनी हवेली लाए और उसे दूसरे कपड़े पहनाने लगे, तो वह चिल्लाने लगा, “मुझे नहीं पहनने ये कपड़े। मैं ऐसे ही रहूंगा।” खैर किसी तरह साहूकार को ज़बरदस्ती कुर्ता-पजामा पहनाया गया। तभी साहूकार के सामने उसके कपड़ों में सजा-धजा छंगा आया। जिसे देख साहूकार गालियां बकने लगा। छंगा हंसते हुए हवेली से बाहर निकला तो पीछे-पीछे साहूकार भागा। यह देख पत्नी समेत सभी को विश्वास हो गया कि साहूकार पागल हो गया है। भोजन के समय फिर छंगा ने साहूकार को तंग करने के लिए सबसे कह दिया कि “साहूकार तीन दिन से भूखे हैं इसलिए इन्हें ठीक से खिलाइए।” अब कोई कहे खीर खाओ, कोई कहे पूरी खाओ, कोई चूरमा खिलाने की कोशिश करे। जिससे परेशान हो साहूकार ने सबके हाथ झटके और क्रोध पूर्वक वहाँ से जाने लगा। यह देख छंगा को साहूकार पर रहम आया और उसने सभी को सच बता दिया।


दोस्तों, हास्य से भरपूर यह कहानी, जिसमें असली समस्या छंगा नहीं बल्कि साहूकार का गुस्सा था, हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है। जब व्यक्ति हर छोटी गलती पर गुस्सा करने लगता है, तब लोग उससे सीखना बंद कर, बचना शुरू कर देते हैं। आज समाज में यही हो रहा है। कुछ बॉस सोचते हैं कि डर से काम निकलता है। कुछ माता-पिता मानते हैं कि डांट से बच्चे सुधरते हैं। कुछ शिक्षक कहते हैं कि सजा देने, टोकने या तुलना करने से विद्यार्थी तेज़ बनते हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। डर इंसान को बेहतर नहीं बल्कि चुप बना देता है और चुप इंसान अक्सर सही साथ या अवसर न मिलने पर ‘छंगा’ बन जाता है!


दोस्तों, जब सम्मान नहीं मिलता, तब मन के भीतर छोटी-छोटी शिकायतें जमा होने लगती हैं। फिर यही शिकायतें, नाराज़गी बनती है और नाराज़गी ज़्यादा समय रहे तो यह ‘बदले के भाव’ में बदल जाती है और याद रखियेगा ‘बदला’ हमेशा बुद्धिमानी से नहीं लिया जाता। कई बार वह छंगा की तरह हास्यास्पद रूप ले लेता है। सोचिए, अगर साहूकार ने पहली गलती पर छंगा को समझाया होता, तो शायद उसे अपनी ही ससुराल में पागल घोषित होने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।


जीवन का एक बड़ा नियम है, लोग आपकी बात नहीं, आपका व्यवहार याद रखते हैं। आपकी शक्ति का असली प्रमाण यह नहीं कि आप कितनों को डरा सकते हैं। असली प्रमाण यह है कि आपके साथ काम करने वाले लोग आपसे कितना जुड़ाव महसूस करते हैं। नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है लोगों को साथ लेकर चलना और परिवार हो, संस्था हो या समाज, जहाँ सम्मान खत्म होता है, वहाँ संबंध धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। इसलिए अगली बार जब कोई छोटी गलती करे, तो गुस्सा करने से पहले एक बार छंगा को याद कर लीजिएगा क्योंकि प्रेम से समझाया गया इंसान आपका सहयोगी बनता है, और अपमानित किया गया इंसान कभी न कभी आपका “छंगा” बन जाता है!


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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