छोड़ दो…
- Nirmal Bhatnagar

- May 2, 2025
- 3 min read
May 2, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

दोस्तों, यह जीवन वाक़ई एक पहेली के समान है, जिसमें तमाम योजना बनाने और अपनी ओर से पूरा प्रयास करने के बाद भी आने वाले पल का अंदाजा लगाना संभव नहीं है। कई बार यह हमारे समक्ष अनपेक्षित रूप से मनचाहे परिणाम लाकर रख देता है, तो कई बार हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ समस्याएँ हमें चारों ओर से घेर लेती हैं। हम संघर्ष करते हैं, भागते हैं, और कभी-कभी टूट भी जाते हैं। मजे की बात तो यह है कि इन सब के बाद भी यह समझ नहीं पाते हैं कि ऐसा कुछ हमारे साथ क्यों हो रहा है।
अगर आप थोड़ा गहराई से इस विषय में सोचेंगे या ज्ञानी और अनुभवी लोगों से सलाह लेंगे तो पायेंगे कि कई बार चारों ओर से घेरने वाली परेशानियों को अनजाने में हम ही आमंत्रित करते हैं और कई बार तो उन परेशानियों को छोड़ने का मौक़ा हाथ में होने के बाद भी उसे आसानी से छोड़ नहीं पाते हैं। आइये, आज इस विषय को हम एक अज्ञात लेखक की लिखी प्रेरणादायी कहानी से समझने का प्रयास करते हैं।
कई साल पहले की बात है, एक कौआ अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लेकर उड़ रहा था और सोच रहा था कि वह इसे किसी शांत स्थान पर जाकर, आराम से बैठकर खायेगा। लेकिन तभी गिद्धों के एक समूह ने कौए को मांस का टुकड़ा ले जाते हुए देख लिया। जिस बात का एहसास कौए को काफ़ी देर बाद हुआ। अर्थात् कौए ने काफ़ी समय बाद देखा कि उसके पीछे कई सारे गिद्ध लगे हुए हैं। बेचारा कौआ यह देख घबरा गया और तेज़ी से ऊँचाई की ओर उड़ने का प्रयास करने लगा। लेकिन गिद्ध तो गिद्ध थे, उनकी आकाश की ऊँचाइयों को छूने और उड़ने की गति कौए से काफ़ी तेज़ थी। इसलिए वे लगातार कौए के पास आते जा रहे थे, जो कौए के डर को बढ़ाता जा रहा था।
आकाश की ऊँचाइयों पर उड़ रहे एक गरुड़ ने यह नज़ारा देखा तो तत्काल समझ गया कि माजरा क्या है। वह तेज़ी से उड़ता हुआ कौए के पास गया और उससे प्रश्न करते हुए बोला, “तुम इतने परेशान क्यों हो?” कौआ बोला, “देखो, ये सारे गिद्ध मुझे मारने के लिए मेरे पीछे पड़े हैं।” गरुड़ मुस्कराया और कौए को समझाता हुआ बोला,“मित्र, ये सभी गिद्ध तुम्हारे पीछे नहीं, बल्कि उस मांस के टुकड़े के पीछे पड़े हैं, जो तुम्हारी चोंच में है। तुम उस मांस के टुकड़े को छोड़ दो और फिर देखो क्या होता है।” कौए ने तुरंत गरुड़ की सलाह को माना और मांस का टुकड़ा गिरा दिया, और जैसे ही वह गिरा, सारे गिद्ध उसे लपकने के लिए उस ओर उड़ गए। अब कौआ हल्का और परेशानियों से मुक्त था।
दोस्तों, कहने की जरूरत नहीं है कि कौए की परेशानी तभी तक तक थी, जब तक उसने मांस के टुकड़े को पकड़ा हुआ था। ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी होता है। हमारी ज़िंदगी में दर्द तब तक ही है, जब तक हम उसे थामे हुए हैं। इसलिए दोस्तों, जीवन में ज़्यादा ऊँचा उड़ना है तो बस छोड़ना सीख जाइये!” सीधे शब्दों में कहूँ तो हम सभी अपने भीतर ईगो, अपेक्षा, तुलना, घमंड, बदले की भावना, और नकारात्मकता आदि जैसे बोझ लेकर चलते हैं। साथ ही यह सोच भी रखते हैं कि ये सब हमें ताकत देंगे, लेकिन वास्तव में ये ही हमारी उड़ान को रोकते हैं। इसलिए दोस्तों, इन सब को बस छोड़ दो!
1) तुलना करना छोड़ दो क्योंकि तुम अपने आप में अद्वितीय हो।
2) बदले की भावना छोड़ दो क्योंकि तुम शांति से जीना चाहते हो और वह शांति तुम्हारे अपने भीतर है।
3) घमंड छोड़ दो क्योंकि तुम जानते हो कि विनम्रता ही असली ताकत है।
4) अपेक्षा करना छोड़ दो क्योंकि तुम जानते हो कि जीवन को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करना हमें ख़ुशी, शांति और संतुष्टि देता है।
याद रखना दोस्तों, जो बोझ हमारा नहीं है, उसे ढोना मूर्खता है। गरुड़ की तरह सोचो, कौए की तरह सीखो, और फिर उड़ान भरो बिना किसी भार के क्योंकि अंततः, उड़ान उसी की ऊँची होती है, जो हल्का होता है। यही ईश्वर का हम सब के लिए संदेश है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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