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जीवन का सार “मैं” से “हम” की ओर बढ़ने में है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 3 days ago
  • 3 min read

Jan 5, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, यह समझ लेना कि “सब कुछ न तो मेरे बारे में है और न ही मेरे लिए है” इंसान को बड़ा बनाता है। आज की दुनिया में यह मान लेना कि हर घटना, हर प्रतिक्रिया और हर रिश्ता सिर्फ हमारे इर्द-गिर्द ही घूमता है—एक बहुत खतरनाक भ्रम है। यह सोच धीरे-धीरे व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना देती है। जब इंसान सिर्फ अपने बारे में सोचने लगता है, तो उसका नज़रिया छोटा हो जाता है, जीवन अशांत हो जाता है और मन हमेशा थका हुआ रहता है। ऐसा व्यक्ति हर बात को इसी सवाल से देखता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?” इस तरह सोचने वाला इंसान दूसरों के दर्द, उनकी परिस्थितियों और उनके संघर्षों को समझ ही नहीं पाता और जब हम दूसरों को समझना छोड़ देते हैं, तब हम खुद भी भीतर से अकेले और परेशान हो जाते हैं।


इसलिए मेरा मानना है कि जीवन में स्वार्थ नहीं, संतुलन चाहिए। अपने हितों का ध्यान रखना गलत नहीं है। यह तो जीवन प्रबंधन है। लेकिन जब अपने हितों के आगे दूसरों का अस्तित्व ही गौण हो जाए, तो ये समझदारी स्वार्थीपन बन जाती है। स्वार्थीपन का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वह सबको चोट पहुँचाता है; पहले दूसरों को और अंत में खुद को। इसके विपरीत जब आप स्वार्थ छोड़कर, संतुलन के साथ जीवन में आगे बढ़ते हैं, तो आप सफलता के साथ समाज में सकारात्मक बदलाव भी ला सकते हैं। उदाहरण के लिए आप नेल्सन मंडेला के जीवन को देखिए, वे स्वार्थ रहित संतुलित उद्देश्य के कारण 27 साल जेल में रहे। अगर वे आत्मकेंद्रित होते, तो अपने उद्देश्य से समझौता कर बाहर आने का प्रयास करते या बाहर आने के बाद बदले की आग में जलते और कहते, “मेरे साथ इतना अन्याय हुआ, अब दुनिया को मेरी पीड़ा समझनी ही होगी।” इसके स्थान पर उन्होंने कहा, “अगर मैं दूसरों से नफ़रत करता रहा, तो कभी आज़ाद नहीं रह पाऊँगा।” मंडेला ने अपने ‘मैं’ को देश के ‘हम’ में बदल दिया और इसी सोच ने उन्हें केवल नेता नहीं, महापुरुष बनाया।


इसी तरह भारत रत्न और भारत के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में से एक रतन टाटा जी ने भी कभी अपनी सफलता को व्यक्तिगत विजय की तरह नहीं देखा। उनका फोकस हमेशा कर्मचारी, समाज और राष्ट्र पर रहा। रतन टाटा का यह व्यवहार सिद्ध करता है कि जब कोई उद्योगपति “मैं” से ऊपर उठकर “हम” में सोचता है, तो उसकी सफलता केवल धन नहीं, सम्मान भी पैदा करती है।


यकीन मानियेगा दोस्तों, पूरी दुनिया मिलकर हमें उतना परेशान नहीं करती, जितना हमारा अपना मन करता है। हम अक्सर खुद से कहते हैं, “लोग मुझे समझ नहीं रहे।” “मेरी कद्र नहीं हो रही।” “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” अंदर की यह आवाज़ हमारी शांति, हमारी सोच को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। अगर इसे नियंत्रित न किया जाये, तो ये हमारे जीवन का सबसे बड़ा बोझ बन सकती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ, “हमारा सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, हमारे भीतर रहता है।”


इसलिए दोस्तों, हमें स्वार्थ को छोड़ संतुलन को चुनना चाहिए क्योंकि जिस दिन इंसान यह स्वीकार कर लेता है कि “हर बात व्यक्तिगत नहीं होती”, “हर प्रतिक्रिया हमारे विरुद्ध नहीं होती”, उसी दिन उसके भीतर शांति उतरने लगती है। याद रखिएगा, दूसरों को समझने से हम कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत होते हैं और नज़र बदलते ही जीवन हल्का हो जाता है।


महान लोग इसलिए महान नहीं होते कि वे हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, बल्कि वे इसलिए महान होते हैं क्योंकि वे हमेशा अपने से आगे सोचते हैं। याद रखिएगा, आपका मन ही आपका सबसे बड़ा शत्रु भी हो सकता है और सबसे बड़ा मित्र भी। चुनाव आपके हाथ में है या तो स्वार्थी बन हर चीज़ को अपने हितों के आधार पर तोलते रहिए, या जीवन को थोड़ा बड़ा, थोड़ा व्यापक और बहुत ज़्यादा शांत बना लीजिए क्योंकि जीवन का सार “मैं” से “हम” की ओर बढ़ने में है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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