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जीवन की सबसे बड़ी पूंजी रिश्ते हैं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 3 days ago
  • 3 min read

Nov 28, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

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यकीन मानियेगा दोस्तों, रिश्ते हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं और इस बात को हम सभी लोग भली भांति जानते हैं, पर दुख इस बात का है कि जानते हुए भी हम लोग रिश्तों को सँभालना नहीं सीखते, बस छोड़ देना सीख लेते हैं। शब्द थोड़े चुभने वाले हैं लेकिन सच यही है। खैर सच जानने, मेरी बात से सहमत होने या ना होने से ज्यादा महत्वपूर्ण रिश्तों को सँभालना सीखना है।


दोस्तों, अगर आप मेरी उपरोक्त बात से सहमत हों तो क्षमा, त्याग और समझौता को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लो क्योंकि ये तीन गुण किसी भी रिश्ते को टूटने नहीं देते। इसी बात के महत्व को समझाते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, “कमजोर लोग कभी क्षमा नहीं कर सकते क्योंकि क्षमा करना तो महान और शक्तिशाली लोगों का गुण है। चलिए, इस बात को हम जीवन के इस महत्वपूर्ण रहस्य को समझाती एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं-


एक बुज़ुर्ग दंपती शादी के 55 साल बाद भी हमेशा खुश और शांत दिखाई देते थे। इसके विपरीत उनके पड़ोसी हमेशा रिश्तों को लेकर थोड़ी उलझन में रहते थे। एक दिन उनके पड़ोसी ने उनसे पूछा, “हमने आप दोनों में कभी विवाद होते नहीं देखा? आपने इतने वर्षों तक आपसी प्रेम को कैसे बनाए रखा?” प्रश्न सुन बुजुर्ग पति ने मुस्कुराकर कहा, “शादी के समय मेरी पत्नी अपने साथ दो सूचियाँ लेकर आई। पहली सूची में उसने मेरी उन आदतों को लिखा, जिन्हें वे पसंद करती थी और दूसरी सूची, मेरी उन 10 बुरी आदतों की थी जिन्हें वे स्वीकार करने को तैयार थी। जब भी मैं गलती करता, वे बिना नाराज़ हुए कहती, ‘ये तुम्हारी उन्हीं बुरी आदतों में से एक होगी, जिसे मैंने पहले ही माफ़ करने का वादा किया था।’ इतना कह वे एक क्षण को रुके फिर अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘और मैं भी समय के साथ उसकी बताई हर कमी को प्यार से पूरा करता चला गया। यही हमारी शादी का रहस्य है, हमने एक-दूसरे की कमियों से लड़ना नहीं सीखा, बल्कि उन्हें प्यार से स्वीकारना सीख लिया है।’


दोस्तों इस कहानी में एक बड़ा संदेश छिपा है, रिश्ते परिपूर्ण नहीं होते, उन्हें हम परिपक्वता, त्याग और क्षमा से सुंदर बनाते हैं। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि क्षमा किसी और के लिए नहीं, बल्कि सबसे पहले खुद के लिए होती है। क्रोध, शिकायत और कटुता मन पर बोझ बनाते हैं। जब हम क्षमा करते हैं, हम इस बोझ को उतार देते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि क्षमा रिश्तों को नया जन्म देती है और इसीलिए मैं क्षमा को; मन को मुक्त करने की शक्ति मानता हूँ।


दोस्तों, किसी को प्रेम करना आसान है, पर उसके लिए कुछ त्याग देना मुश्किल। लेकिन जहाँ त्याग होता है वहीं असली प्रेम भी होता है। इसलिए जहाँ प्रेम महत्वपूर्ण हो वहाँ कभी-कभी अपने शब्दों का, अपने अहंकार का और अपनी सुविधा का त्याग कर देना चाहिए। यही त्याग रिश्तों को गहराई देता है। याद रखियेगा, त्याग हमें छोटा नहीं, बल्कि महान बनाता है। इसलिए मैं त्याग को प्रेम का सबसे पवित्र रूप मानता हूँ।


परिपक्व व्यवहार, क्षमा और त्याग के बाद अंतिम महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति के भाव के साथ जीना है। इसके लिए सबसे पहले स्वीकारें कि समझौता हार नहीं है, यह बुद्धिमानी है। इस दुनिया में हर किसी की सोच, अपेक्षाएँ और दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं। ऐसे में आपसी प्रेम बनाए रखने के लिए थोड़ा झुकना, थोड़ा समझना और थोड़ा मानना, रिश्तों में मिठास बनाए रखता है। याद रखियेगा, समझौता वह पुल है, जो भिन्न विचारों को जोड़ता है। इसलिए मैं समझौता करते हुए स्वीकारोक्ति के भाव के साथ जीने को रिश्तों का सुरक्षा कवच मानता हूँ।


दोस्तों, याद रखियेगा आज दुनिया में लोग जीतना चाहते हैं, पर रिश्ते जीत से नहीं, दिल से चलते हैं। इसलिए माफ़ी, त्याग और स्वीकारोक्ति का भाव या समझौता, वो कीमती चीज़ें हैं जो हमारे सभी रिश्तों को आसान, टकराव रहित और असरदार बनाए रखती हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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