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जीवन में बढ़ना हो आगे तो स्वीकारें गलतियों को…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

Nov 29, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

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दोस्तों, मेरा यह कहना निश्चित तौर पर अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस दुनिया या यूँ कहूँ कि इस जीवन का सबसे आसान कार्य दूसरों की गलतियाँ पकड़ना है और सबसे कठिन कार्य अपनी गलतियों को स्वीकारना है। सही कहा ना मैंने? दोस्तों, काम के दौरान ग़लतियाँ होना स्वभाविक है। इसी बात को समझाते हुए एक बार अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, “जिसने कभी गलती नहीं की, उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश ही नहीं की।” इसलिए मैं गलतियों को राह का रोड़ा नहीं बल्कि जीवन का दर्शन मानता हूँ क्योंकि ग़लतियाँ हमें तोड़ने नहीं, बल्कि गढ़ने आती हैं।


चलिए, इसी बात को हम एक ऐसी छोटी-सी कहानी से समझने का प्रयास करते हैं, जो हमें खुद से मिलवाती है। बात कई साल पुरानी है गाँव में रहने वाले एक बुज़ुर्ग संत, जो अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे, के पास एक बार गाँववासी एक युवा को लेकर आए और बोले, “गुरुदेव, यह व्यक्ति हमेशा गलतियाँ करता है। इसे कुछ समझाइए!” गाँववासियों की बात सुन संत मुस्कुराए और बोले, “ठीक है। इसे कुछ देर के लिए मेरे पास छोड़ दो।”


गाँववासियों ने वैसा ही करा और उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चले गए। संत ने उस युवा को पहले भोजन करवाया और फिर बोले,“चलो, आज हम दोनों मिलकर दूसरों की गलतियाँ ढूँढते हैं।” वह युवा इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। उस दिन वे दोनों दिन भर गाँव में घूमे और लोगों को, उनके कामों को क़रीब से देखा। संध्या आरती के बाद संत ने उस युवा से पूछा, “कितनी गलतियाँ ढूँढीं?” वह युवा एकदम जोश के साथ खुश होते हुए बोला, “गुरुदेव, बहुत सारी!” जवाब सुन संत मुस्कुराए और बोले, “अब कल हम खुद की गलतियाँ ढूँढेंगे। अभी तुम जाकर आराम करो।”


अगले दिन सुबह जैसे ही वह युवा संत के पास पहुँचा, उन्होंने उसे ख़ुद की ग़लतियाँ बताने के लिए कहा। वह युवा काफ़ी देर तक सोचता रहा लेकिन अपनी एक भी गलती नहीं खोज पाया। अंत में उसने संत से शाम तक का समय माँगा और वहाँ से चला गया। शाम को वह तय समय पर संत के पास पहुँचा और बोला, “गुरुदेव, मैंने खूब गहराई से चिंतन और मनन किया लेकिन उसके बाद भी मुझे कहीं कोई गलती नजर नहीं आई।”


युवा का जवाब सुनते ही संत एकदम शांत और गंभीर स्वर में बोले, “वत्स, बस यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है।” जवाब सुनते ही वह युवा चौंक गया और प्रश्न वाचक निगाहों से संत को देखने लगा। संत ने उसकी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करते हुए कहा, “याद रखो, दूसरों की गलतियाँ ढूँढना आसान है, क्योंकि उसमें हमारा अहंकार खिलता है, पर अपनी ग़लतियों को पहचान पाना मुश्किल है, क्योंकि उसमें हमारा अहंकार पिघलता है। याने अहंकार को छोड़े बिना ख़ुद की ग़लतियों को पहचान पाना मुश्किल है।जिस दिन तुम अपनी गलतियाँ देखने लगोगे, उसी दिन से तुम्हारा विकास शुरू होगा।”


कहने की जरूरत नहीं है दोस्तों कि संत की इस एक सलाह ने उस युवा के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया होगा। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि ग़लतियाँ हमारी दुश्मन नहीं, शिक्षक हैं। चलिए दोस्तों हम तीन सूत्रों के माध्यम से यह जानने का प्रयास करते हैं कि गलतियाँ किस तरह से हमें बदलती हैं:

1) गलतियाँ हमें विनम्र बनाती हैं क्योंकि जो अपनी कमियाँ देख सकता है, वही महान बन सकता है।

2) गलतियाँ हमें सिखाती हैं क्योंकि हर गलती एक दिशा-सूचक है। वह हमें बताती है कि कहाँ सुधारना है, कहाँ संभलना है।

3) गलतियाँ हमें इंसान बनाती हैं क्योंकि जो खुद गलती करता है और स्वीकारता है, वह दूसरों को भी स्वीकारना सीख लेता है।


दोस्तों, जो इंसान अपनी गलती को पहचान लेता है, वह बदल सकता है और जो इंसान अपनी गलती छिपाता है, वह हमेशा वैसा ही रहता है जैसा वो पूर्व में था। याद रखियेगा, जीवन में अपूर्णता कोई समस्या नहीं, बल्कि सच्चाई है और अपनी गलतियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, परिवर्तन का पहला कदम है और जो इंसान बदलने को तैयार है, उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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