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दूसरों के जीवन में आशा का दीप जलाएं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 hour ago
  • 3 min read

Mar 19, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


चलिए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है चंद्रनगर में एक बहुत धनी सेठ रहता था। वह कई फैक्ट्री और बंगलों का मालिक था याने उसके पास धन और वैभव की कोई कमी नहीं थी। एक रात अचानक ही उसे बहुत बेचैनी होने लगी। उसने तत्काल दवाई खाई लेकिन उससे भी उसे कोई फ़ायदा नहीं हुआ। जब वह रात तीन बजे तक बेचैनी की वजह से सो नहीं पाया तो वह घर के बाहर टहलने लगा।


टहलते-टहलते सेठ काफ़ी दूर निकल आया और अंत में थककर पेड़ के नीचे बने एक चबूतरे पर बैठ गया। तभी एक कुत्ता उसकी चप्पल उठा कर पास की झोपड़ी में भाग गया। सेठ भी उसके पीछे-पीछे गया और अपनी चप्पल देखने लगा। तभी उसके कानों में किसी के रोने की आवाज पड़ी। जिसे नजरअंदाज कर सेठ पहले तो आगे बढ़ गया, लेकिन उसी क्षण उसके भीतर से आवाज आई, “जाकर देखो, शायद किसी को मदद की जरूरत हो।”


अंतर्मन की आवाज को सुन सेठ वापस लौटा और झोपड़ी के अंदर झांकने लगा। उसने देखा कि अंदर एक गरीब महिला अपनी बीमार बच्ची के पास बैठकर रो रही थी। देखने से साफ़ समझ आ रहा था कि बच्ची गंभीर रूप से बीमार थी और महिला के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। महिला ने सेठ को बताया कि उसने सब जगह मदद माँगी, पर कोई सहायता करने को तैयार नहीं हुआ। अंत में किसी संत ने उसे कहा था कि सुबह उठकर ईश्वर से प्रार्थना करना, वह जरूर मदद करेगा। यह सुनकर सेठ का दिल पिघल गया। उसने तुरंत एम्बुलेंस बुलवाई, बच्ची को अस्पताल पहुँचाया और उसके इलाज की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इतना ही नहीं उस बच्ची के ठीक होने के बाद सेठ ने उस महिला को काम भी दिया और बच्ची की पढ़ाई की व्यवस्था भी कर दी।


इस घटना में अद्भुत बात यह थी कि बच्ची की मदद करते ही सेठ की बेचैनी समाप्त हो गई। उस रात उसे पहली बार जीवन में गहरी शांति महसूस हुई। उसने सोचा, शायद यही ईश्वर है, जो किसी की पीड़ा देखकर हमें किसी और के जीवन में मदद करने के लिए भेज देता है।


दोस्तों, यही जीवन का गहरा सत्य है। ईश्वर केवल मंदिरों, मस्जिदों या ग्रंथों में नहीं है। ईश्वर वहाँ प्रकट होता है, जहाँ किसी की पीड़ा कम करने का भाव जागता है। इसी भाव को अपने जीवन में सुधा मूर्ति जी ने जिया था। व्यवसायिक जीवन में अपार सफलता पाने के बाद भी सुधा मूर्ति जी ने अपनी जीवनशैली एकदम साधारण रखी और अपनी ऊर्जा और संपत्ति का बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगाया। उन्होंने हमेशा गरीबों और जरूरतमंदों को शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए मदद दी और हजारों लोगों के जीवन को बदलने का कार्य किया। वे हमेशा कहती हैं, “सच्ची सफलता वह है, जिससे किसी और का जीवन बेहतर हो सके।”


दोस्तों, धन कमाना गलत नहीं है। सफलता पाना भी गलत नहीं है। लेकिन यदि हमारी सफलता केवल हमारे लिए है, तो वह अधूरी है। जीवन तब पूर्ण होता है जब हमारे कर्मों से किसी और के जीवन में आशा का दीपक जलता है। याद रखिएगा, दुनिया में सबसे गहरी शांति तब मिलती है जब हम किसी के आँसू पोंछने का कारण बनते हैं और शायद यही वह क्षण होता है जब हम ईश्वर को अपने सबसे करीब महसूस करते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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