धक्का दे कर तो देखिए, शायद दरवाज़ा खुला हुआ हो…
- Nirmal Bhatnagar

- Feb 26
- 3 min read
Feb 26, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, किस्मत के ताले की चाबी हमारे मन के अंदर होती है और हम उसे परिस्थितियों, मौकों और भी ना जाने कहाँ-कहाँ तलाशते रहते हैं। चलिए, इस बात को गहराई से समझने के लिए पहले मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ। गाँव के बाहरी इलाक़े में एक युवा रहता था जो मजबूत से मजबूत ताले को पल भर में खोलने के लिए पूरे इलाके में मशहूर था। एक दिन कुछ लोगों ने उसकी परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने उसे चुनौती देते हुए कहा, “हम तुम्हें एक संदूक में बैठाकर पानी में उतारेंगे। तुम्हें उस संदूक के ताले को खोल कर बाहर निकलना होगा। लेकिन अगर तुम उसमें असफल रहते हो तो आपातकालीन बटन दबाकर हार मान सकते हो।”
वह युवा आत्मविश्वास से भरा था, इसलिए उसने हँसते हुए सब की बात टाल दी। कुछ ही क्षणों बाद उसे एक लोहे के संदूक में बैठाकर पानी में उतार दिया गया। पानी के अंदर जाते ही उसने जेब से तार निकाला और ताला खोलने का प्रयास करने लगा। एक बार… दो बार… पाँच बार… पर ताला खुला नहीं। इसी बीच उसकी साँस रुकने लगी, घबराहट बढ़ने लगी, दिमाग तेज़ी से काम करने लगा। आखिरकार उसने हार मान ली और आपातकालीन बटन दबा दिया। उसके ऐसा करते ही वहाँ मौजूद लोगों ने संदूक को बाहर निकाला और उसके कुंडे को हल्का सा धक्का दिया। उनके ऐसा करते ही संदूक खुल गया क्योंकि उस पर ताला था ही नहीं। उस क्षण उस व्यक्ति को समझ आया, समस्या ताले में नहीं, बल्कि उसकी सोच में थी।
दोस्तों, यही हमारे जीवन का सच है। हम अक्सर मान लेते हैं कि हमारी किस्मत ख़राब है, भाग्य फूटा हुआ है, जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता बंद है, लोग हमारे खिलाफ हैं, हालात हमारे साथ नहीं हैं, सफलता मुश्किल है और फिर हम उसी मान्यता के आधार पर संघर्ष करते रहते हैं। लेकिन सच यह है, कई बार जीवन का दरवाज़ा बंद नहीं होता, हम बस उसे खोलने की कोशिश गलत दिशा में कर रहे होते हैं।
इसी मानसिकता को तोड़कर एक माँ ने स्लो लर्नर बच्चे को दुनिया को नई दिशा देने वाला महान वैज्ञानिक बना दिया। जिन्हें हम अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम से जानते हैं। बचपन में उन्हें “स्लो लर्नर” कहा गया। उनके शिक्षकों का मानना था कि यह लड़का कुछ खास नहीं कर पाएगा। अगर आइंस्टीन की माँ शिक्षकों की यह बात मान लेती कि उनके बेटे के लिए ज्ञान का दरवाज़ा बंद है, तो शायद वे भी हार मान लेती। लेकिन उन्होंने खुद से एक सवाल पूछा, “अगर सब लोग सही हैं, तो मेरा बेटा अलग क्यों सोचता हूँ?” इसी सवाल ने उन्हें कुछ और करने के लिए प्रेरित किया, जिसकी वजह से अल्बर्ट आइंस्टाइन के बंद समझे जाने वाले दिमाग़ के दरवाज़े खुल गए और स्लो लर्नर माने जाने वाला लड़का आगे चलकर ब्रह्मांड के नियम समझाने वाला महान वैज्ञानिक बना।
दोस्तों, जीवन में सबसे बड़ी गलती असफल होना नहीं है। सबसे बड़ी गलती है, कोशिश किए बिना मान लेना कि ताला बंद है। हम डरते हैं, इसलिए रुक जाते हैं। हम सोचते हैं, इसलिए कोशिश नहीं करते। हम मान लेते हैं, इसलिए आगे नहीं बढ़ते। लेकिन याद रखिए, अक्सर डर वास्तविक नहीं होता, वह सिर्फ़ कल्पना होता है। आज अपने जीवन के संदूक को देखिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप भी किसी “बंद ताले” को खोलने में लगे हैं… जो असल में लगा ही नहीं है ? शायद अवसर सामने है, शायद रास्ता खुला है, शायद समाधान पास है, बस आपको एक छोटा-सा धक्का देना है।
दोस्तों, जीवन का नियम सरल है, सीमाएँ अक्सर बाहर नहीं, भीतर होती हैं। जिस दिन आप अपनी सोच के ताले तोड़ देते हैं, उसी दिन दुनिया के दरवाज़े खुलने लगते हैं। इसलिए अगली बार जब लगे कि रास्ता बंद है, रुकिए नहीं। घबराइए नहीं। बस एक बार धक्का देकर देखिए। क्योंकि हो सकता है, जिसे आप बंद दरवाज़ा समझ रहे हैं, वह असल में खुला हुआ अवसर हो।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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