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प्रेम बंधन का नाम नहीं है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 16 hours ago
  • 3 min read

July 6, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, सूक्ष्म अंतर होने के बावजूद भी अक्सर लोग प्रेम और रिश्ते को एक ही मान लेते हैं। जबकि रिश्ता एक सामाजिक व्यवस्था हो सकता है, लेकिन प्रेम एक आंतरिक अवस्था है। रिश्ता नाम देता है, प्रेम अर्थ देता है। रिश्ता दिखाई देता है, प्रेम महसूस किया जाता है। इस अंतर को ना समझ पाने के कारण जीवन में समस्या तब शुरू होती है, जब प्रेम पर अधिकार का रंग चढ़ने लगता है। जिसकी वजह से प्रेम में “तुम जैसे हो, वैसे ही स्वीकार हो” के भाव पर “तुम मेरे हो” का भाव भारी पड़ जाता है और यहीं से प्रेम का स्वाभाविक प्रवाह रुकने लगता है।


दोस्तों, जब प्रेम में अत्यधिक अपेक्षाएँ, मांगें, नियंत्रण और स्वामित्व की भावना प्रवेश कर जाती है, तब वह धीरे-धीरे बंधन बन जाता है। फिर दोनों ही व्यक्ति एक-दूसरे को समझने से अधिक बदलने की कोशिश करने लगते हैं। इसी वजह से प्रेम का स्थान तर्क ले लेता है, विश्वास की जगह संदेह आ जाता है और अपनापन धीरे-धीरे अधिकार में बदल जाता है।


याद रखिएगा दोस्तों, सच्चा प्रेम किसी को अपने अनुसार ढालने की कोशिश नहीं करता। वह व्यक्ति के व्यक्तित्व, सपनों और स्वतंत्रता का सम्मान करता है। वह यह नहीं कहता कि “मेरे लिए बदल जाओ”, बल्कि कहता है कि “अपने श्रेष्ठ स्वरूप में विकसित हो जाओ, मैं तुम्हारे साथ हूँ।” इसीलिए प्रेम को एक खुले आकाश में उड़ते पक्षी की तरह बताया है। जिसे साँस लेने के लिए विश्वास चाहिए, बढ़ने के लिए स्वतंत्रता चाहिए और जीवित रहने के लिए सम्मान चाहिए। यदि हम उसे पिंजरे में बंद कर देंगे, तो पक्षी हमारे पास तो रह जाएगा, लेकिन शायद उसकी उड़ान, उसका संगीत और उसका आनंद समाप्त हो जाएगा।


दोस्तों, इसका अर्थ यह नहीं कि रिश्ते आवश्यक नहीं हैं। रिश्ते भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन रिश्ते तभी सुंदर बनते हैं जब उनकी नींव प्रेम पर हो, अधिकार पर नहीं; विश्वास पर हो, भय पर नहीं; सहयोग पर हो, नियंत्रण पर नहीं। अगर आप भी बेहतरीन रिश्तों के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं तो इस महत्वपूर्ण बात या यूँ कहूँ सत्य को हमेशा याद रखियेगा, जो व्यक्ति स्वयं से प्रेम नहीं करता, वह लंबे समय तक किसी और से भी स्वस्थ प्रेम नहीं कर सकता। जो भीतर से खाली होता है, वह प्रेम नहीं, सहारा खोजता है और जहाँ प्रेम के स्थान पर निर्भरता आ जाती है, वहाँ रिश्ते बोझ बनने लगते हैं।


दोस्तों, इसलिए सबसे पहले स्वयं को स्वीकार करना सीखिए। अपनी कमियों के साथ स्वयं से मित्रता कीजिए। जब आप भीतर से पूर्ण होते हैं, तब आप किसी से प्रेम पाने के लिए नहीं, बल्कि प्रेम बाँटने के लिए रिश्ते बनाते हैं। याद रखिएगा, जीवन के सबसे सुंदर रिश्ते वे नहीं होते जहाँ दो लोग एक-दूसरे को बाँधकर रखते हैं। सबसे सुंदर रिश्ते वे होते हैं जहाँ दोनों एक-दूसरे के विकास का कारण बनते हैं, एक-दूसरे के सपनों का सम्मान करते हैं और एक-दूसरे को अपनी पहचान बनाए रखने की पूरी आज़ादी देते हैं।


इसीलिए मैं फ़ैमिली या रिलेशनशिप काउंसलिंग एवं फ़ैमिली सेशंस के दौरान हमेशा कहता हूँ, “प्रेम किसी को अपने पास बाँधने का नाम नहीं है। प्रेम वह शक्ति है जो दो स्वतंत्र व्यक्तियों को इस तरह जोड़ती है कि दोनों साथ भी रहें और अपने-अपने आकाश में उड़ भी सकें।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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