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मन अगर शांत हो, तो उत्तर स्वयं मिलने लगते हैं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jul 5, 2025
  • 2 min read

Jul 5, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

दोस्तों, जीवन में अक्सर हम उन बातों, परेशानियों या चिंताओं में उलझे हुए होते हैं, जिनसे हमारा सामना असलियत में कभी होना ही नहीं है। अर्थात् कई बार हमारी सबसे बड़ी चिंता या समस्या, वास्तव में कोई समस्या होती ही नहीं है, वो तो बस हमारे दिमाग़ की उपज होती है। चलिए इस बात को हम एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं।


एक बार की बात है, एक गांव में एक आदमी रहता था जिसे ताला खोलने की कला में महारत हासिल थी। चाहे कोई भी ताला हो, वह आसानी से खोल लेता था। उसकी यह प्रतिभा गाँवभर में प्रसिद्ध थी। एक दिन कुछ लोगों ने उसकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। उसे बताया गया कि एक प्रतियोगिता में उसे भाग लेना है जिसमें उसे एक संदूक में बैठाकर पानी में उतारा जाएगा। यदि वह अंदर लगे ताले को खोल लेता है, तो जीत जाएगा। अगर ताला नहीं खुला तो वह 'आपातकालीन बटन' दबाकर बाहर आ सकता है लेकिन तब वह प्रतियोगिता हार जाएगा।


आदमी ने चुनौती स्वीकार की और जैसे ही पानी में उतारा गया, उसने अपनी सारी ऊर्जा ताला खोलने में लगा दी। बार-बार कोशिश की, लेकिन ताला खुला ही नहीं। अंततः सांस लेने की समस्या होने लगी और उसने हार मानते हुए आपातकालीन बटन दबा दिया। संदूक को बाहर निकाला गया, और जब उसे खोला गया तो सबको यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उस संदूक में ताला था ही नहीं! वह बिना किसी प्रयास के भी खुल सकता था!


उस व्यक्ति ने तब महसूस किया कि उसने बिना देखे ही मान लिया कि ताला बंद है। उसने ताला खोलने में इतनी ऊर्जा, समय और चिंता लगा दी, जबकि यदि वह पहले थोड़ा शांत होकर सोचता, तो देख सकता था कि दरवाजा खुला ही है।


दोस्तों हक़ीक़त में यह कहानी हमारे जीवन की भी सच्चाई है। हम कई बार किसी परिस्थिति को बिना देखे, बिना समझे एक बड़ी समस्या मान लेते हैं और उस पर अत्यधिक सोच-विचार करते हैं। कई बार हम दिमाग को इतना उलझा लेते हैं कि समाधान हमारे सामने होते हुए भी हम उसे देख नहीं पाते।


जब हम यह मान बैठते हैं कि समस्या बड़ी है, तब हम एक तयशुदा मानसिक ढांचे में सोचने लगते हैं। हम यह नहीं देखते कि क्या वास्तव में वह समस्या उतनी बड़ी है जितना हम सोच रहे हैं? हो सकता है कि समाधान बेहद आसान हो, बस नजरिए को थोड़ा बदलने की जरूरत हो। इसलिए जरूरी है कि किसी भी परिस्थिति में शांति से, धैर्य से और खुले मन से विचार करें। हर बार जटिलता में हल ढूंढना जरूरी नहीं होता। कई बार सबसे आसान रास्ता ही सबसे प्रभावी होता है।


इसलिए दोस्तों, जीवन में कभी भी, कहीं भी ख़ुद को बँधा हुआ पाएँ या कोई भी ताला बंद लगे, तो एक बार हल्के से धक्का देकर देखिए… हो सकता है कि वह पहले से ही खुला हो।


निष्कर्ष:

समस्या से पहले सोचिए — क्या यह वास्तव में समस्या है? और अगर है, तो क्या मैं उसे शांत मन से देख पा रहा हूँ? हो सकता है समाधान आपके सामने ही हो — बस नजर और नजरिया बदलने की ज़रूरत हो। याद रखिएगा दोस्तों, “मन अगर शांत हो, तो उत्तर स्वयं मिलने लगते हैं।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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