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लक्ष्य और उसे पाने का तरीका, दोनों ही हैं महत्वपूर्ण !!!

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
Jan 17
1 min read

Jan 17, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, यकीन मानियेगा आज की कहानी आपको भीतर तक झकझोर देगी क्योंकि यह सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह तो आपको मनुष्य के चरित्र, कर्म और उसके परिणाम की गहराई से आपका परिचय करवाती है। कहानी कांचीपुर नामक गांव की है, जहाँ वज्र नाम का एक चोर रहता था। जिसका दिल उसके नाम वज्र की भांति, पत्थर जैसा कठोर था। वह हमेशा मौक़े की तलाश में रहता था इसलिए उसे जहाँ जो भी मिलता था, वह उसे चुरा लिया करता था। उसे कभी यह ख्याल नहीं आया कि जिस व्यक्ति की चीज़ वह ले जा रहा है, उस पर कैसी मुसीबत टूटेगी?


चोरी के पश्चात वह चुराये हुए धन को, सिपाहियों के डर से जंगल में जमीन के नीचे छुपा दिया करता था। एक दिन वज्र को जंगल में धन छुपाते समय वीरदत्त नामक लकड़हारे ने देख लिया। चोर के जाने के बाद वीरदत्त ने कुछ क्षणों के लिए विचार किया और फिर वापस से गड्डा खोद कर उसमें से 10% धन निकाल लिया। यह इतना चतुराई भरा निर्णय था कि चोर को कभी इस चोरी का एहसास ही नहीं हुआ। याने उसे कभी पता ही नहीं चला कि उसका धन धीरे-धीरे कम हो रहा है।


कुछ समय बाद वीरदत्त ने चोरी से इकट्ठा किए उस धन को अपनी पत्नी को दिया और उससे बोला, “देखो, अब तुम्हें जो चाहिए था, वह सब मिल सकता है।” लेकिन पत्नी की बात ने उसकी सोच बदल दी। उसने कहा, “जो धन परिश्रम से न कमाया गया हो, वह टिकता नहीं। उसे जनता की भलाई में लगाना चाहिए।” यही वाक्य विरदत्त के जीवन का मोड़ बन गया। उसने चोरी के धन से एक विशाल तालाब खुदवाया, जो साल के बारहों महीने कभी सूखता नहीं था। पर तालाब पूर्ण होते-होते सारे पैसे ख़त्म हो गए जिसकी वजह से वो उसमें सीढ़ियाँ नहीं बनवा पाया। इस समस्या के समाधान के लिए वह एक बार फिर उसी चोर के पीछे लगा, और उसके धन का दसवाँ हिस्सा चुराकर तालाब को पूरा करवाया। इतना ही नहीं, उसने तालाब के किनारे पर भगवान शिव और विष्णु के बड़े सुंदर मंदिर बनवाए, बंजर जमीन को उपजाऊ बनवाया, और गरीबों में सहायता बाँटी।


गाँव के लोगों ने उसकी सेवा और विशाल हृदय को समझ कर उसे सम्मानपूर्वक “द्विजवर्मा” का नाम दिया। जब उसकी मृत्यु हुई, तो यमदूत और भगवान शंकर के गण दोनों उसे लेने पहुँच गए और दोनों के बीच उसके द्वारा किए गए कार्य और उसके फल को लेकर तर्क-वितर्क होने लगा। तभी नारद जी वहाँ प्रकट हुए और अपना मत बताते हुए बोले, “इसने भले काम तो किए, लेकिन चोरी के धन से। जब तक यह उस गलत कमाई का प्रायश्चित नहीं कर लेता, तब तक इसे उसके परिणाम को भोगना होगा और बारह वर्षों तक प्रेत के रूप में भटकना पड़ेगा।” नारद जी की बात सुनकर सभी दूत लौट गए, और द्विजवर्मा बारह वर्षों तक वायु-रूप में भटकता रहा।


दोस्तों, इस पौराणिक कथा का संदेश बेहद स्पष्ट है, परोपकारी होना अच्छा और महान कार्य है, लेकिन परोपकार के लिए गलत रास्ता चुनना भी सही नहीं है। आज के इस तेज़ी से बदलते युग में भी कई लोग यही गलती कर रहे हैं, याने वे अच्छे उद्देश्यों की पूर्ति ग़लत तरीक़े से कर रहे हैं। लेकिन सच तो यही है कि गलत रास्ते से किया हुआ कोई भी अच्छा काम पूरा फल नहीं देता। पुण्य तो तभी फल देता है, जब वह पवित्र मार्ग से अर्जित किया जाए। इसलिए ही तो कहा जाता है कि, “गलत तरीकों से मिला धन अंत में दुख, भय और परिणामों की आग में ही जल जाता है।”


दोस्तों, अगर आप कर्मों के इस खेल पर विश्वास रखते हैं तो आज खुद से निम्न वादे करें—

1) मेहनत की कमाई ही सबसे पवित्र है

2) ईमानदारी ही सबसे बड़ा धर्म है और

3) भलाई तभी चमकती है, जब उसका आधार सही हो


याद रखिएगा दोस्तों, कर्म का फल मिलता जरूर है, इसलिए रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना लक्ष्य।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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