लोगों की क्षमता में निवेश, संगठन के भविष्य में निवेश है…

Sep 22, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, किसी संस्था की सफलता का मूल्यांकन हम अक्सर उसके कारोबार, मुनाफे और विस्तार से करते हैं। लेकिन कभी-कभी एक संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके वित्तीय परिणामों में नहीं, बल्कि उन ज़िंदगियों में दिखाई देती है, जिन्हें उसने नई दिशा दी होती है। तमिलनाडु की केपीआर मिल्स की शिक्षा पहल हमें इसी व्यापक सोच से परिचित कराती है।
वर्ष 1998 में केपीआर मिल्स के चेयरमैन के. पी. रामास्वामी एक दिन कर्मचारियों के साथ चर्चा कर रहे थे। उस वक्त एक महिला कर्मचारी ने उन्हें बताया कि ग़रीबी के कारण उसके माता-पिता ने पढ़ाई छुड़ाकर, उसे इस मिल में काम करने भेज दिया है। वह तो आगे पढ़ना चाहती थी। उस बच्ची की बात सुन रामास्वामी ने व्यवसाय की दुनिया में प्रचलित कर्मचारी विकास, एट्रिशन दर, टैलेंट रिटेंशन जैसे प्रिंसिपल्स को नजरअंदाज कर महिलाओं के लिए 8 घंटे की वर्किंग के बाद 4 घंटे पढ़ने की व्यवस्था की और इसके लिए बक़ायदा शिक्षकों को नियुक्त कर कक्षाएँ और लैब बनवाईं। इसके पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ़ इतना था कि वे अपने कर्मचारियों को इतना सक्षम बनाए कि वे बेहतर अवसरों के लिए संस्था से बाहर भी जा सकें। उनकी इसी सोच के चलते आज केपीआर मिल्स से शिक्षा पूर्ण कर कई महिला कर्मचारी शिक्षण जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सेवा दे रही हैं।
रामास्वामी की इस पहल की गंभीरता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ‘द प्रिंट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक केपीआर मिल्स से 41,000 से ज़्यादा महिला कर्मचारियों ने स्नातक की पढ़ाई पूर्ण कर ली है। यह कार्यक्रम केवल फीस भरने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य महिला कर्मचारियों को उनकी क्षमताओं के अनुसार सही मंजिल तक पहुंचाना भी था। प्यार और अपनत्व भरी इस पहल की वजह से ही आज मिल्स की महिला कर्मचारी उन्हें स्नेह से ‘अप्पा’ याने पिता कहती हैं। उनके लिए यह संबोधन केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है जिसमें रोजगार के साथ शिक्षा और भविष्य की संभावनाएँ भी शामिल हैं।
दोस्तों, एक कोच और कंसल्टेंट के रूप में मेरा अनुभव कहता है कि किसी कर्मचारी को केवल उसकी वर्तमान भूमिका के आधार पर देखना नेतृत्व की सीमित दृष्टि है। हर व्यक्ति के भीतर ऐसी संभावनाएँ हो सकती हैं, जिनका वर्तमान नौकरी से आगे भी महत्व है। केपीआर मिल्स का दृष्टिकोण इसी सोच को चुनौती देता है। कंपनी से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, शिक्षा पूरी करने के बाद बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर जाने वाले कर्मचारियों को हमेशा नुकसान के रूप में नहीं देखा जाता। कुछ पूर्व कर्मचारी नर्सिंग, शिक्षण, पुलिस सेवा और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने के बाद भी कंपनी से किसी ना किसी रूप में जुड़े हुए हैं। यहीं पर एम्प्लॉयी रिटेंशन और एम्प्लॉयी एम्पावरमेंट के बीच अंतर समझ आता है। किसी व्यक्ति को केवल संस्था में बनाए रखना एक लक्ष्य हो सकता है; लेकिन उसे इतना सक्षम बनाना कि वह अपने जीवन के बेहतर विकल्प चुन सके, उससे कहीं व्यापक जिम्मेदारी है।
दोस्तों, व्यवसाय में निवेश का अर्थ केवल मशीनरी, तकनीक और विस्तार में पूँजी लगाना नहीं है। लोगों की क्षमता में निवेश भी संगठन के भविष्य में निवेश है। शिक्षा किसी कर्मचारी को सिर्फ बेहतर पद के लिए तैयार नहीं करती। वह उसके आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और परिवार की अगली पीढ़ी की आकांक्षाओं को भी प्रभावित करती है। एक शिक्षित महिला अपने बच्चों के लिए नई संभावनाओं की कल्पना कर सकती है और अपने समुदाय की दूसरी लड़कियों के लिए उदाहरण बन सकती है।
इसलिए ही मेरा मानना है कि सच्चा नेतृत्व लोगों को अपने अधीन रखने में नहीं, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में दिखाई देता है। एक संस्था जब अपने कर्मचारियों को केवल श्रमशक्ति नहीं, बल्कि सपनों, प्रतिभा और संभावनाओं से भरे मनुष्य के रूप में देखती है, तब उसका प्रभाव उसके परिसर की सीमाओं से बाहर निकल जाता है। याद रखिएगा, रोजगार किसी व्यक्ति को आज संभाल सकता है, लेकिन शिक्षा उसे आने वाले कल को स्वयं गढ़ने की शक्ति दे सकती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




Comments