वास्तव में सुख है कहाँ?
- Nirmal Bhatnagar

- 4 days ago
- 3 min read
Jan 21, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, तेज़ी से भागती इस दुनिया में हम रोज़ जीवन जी तो लेते हैं, पर इस भागदौड़ में रुककर यह सोचना या पूछना ही भूल जाते हैं कि, ‘वास्तव में सुख है कहाँ?’ और जब हम सोचते या पूछते नहीं हैं तो अक्सर मान कर चलते हैं कि, ‘खुशी किसी और के हिस्से में है!’ याने सुखी तो सिर्फ़ वे लोग हैं जो हमसे आगे हैं या जो हमसे ज़्यादा कमा रहे हैं या फिर जो ज़्यादा ताक़तवर हैं या जिनका नाम या रुतबा हमसे ज़्यादा है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुख न तो किसी पद में छुपा होता है और ना ही किसी की जेब में। दूसरे और सीधे शब्दों में कहूँ तो ‘सुख हमारी परिस्थितियों में नहीं, हमारी सोच में बसता है।’ याने हमारी दृष्टि बदलते ही हमारी सृष्टि याने हमारे जीवन में खुशी की शुरुआत हो जाती है।
सहमत न हों, तो जरा अपने आस-पास देखिए, आपको कोई न कोई यह कहता हुआ मिल ही जाएगा कि, “अगर थोड़ा और पैसा आ जाए, तो चैन मिल जाएगा।” इसी तरह कोई कहता हुआ दिखेगा कि, “अगर कर्ज उतर जाए, तो सांस में सांस आ जाएगी।” या कोई कहेगा कि, “किसी तरह में ब्रांड बन जाऊँ, बाजार में मेरी पहचान बढ़ जाए, तो जीवन सफल हो जाएगा।” इतना ही नहीं इससे दिलचस्प तो यह है कि जिसके पास पैसा है, उसे डर है कि कहीं चला न जाए। जिसके पास व्यापार है, उसे घाटे की चिंता है। जिसके पास नाम है, उसे बनाए रखने की बेचैनी है। याने इस दुनिया में हर स्तर पर चिंता का चेहरा बदलता है, लेकिन चिंता कहीं खत्म नहीं होती।
जी हाँ दोस्तों, हम अक्सर दूसरों की थाली देखकर अपनी भूख मापते हैं। हमें लगता है, “वह ज्यादा सुखी है, क्योंकि उसके पास यह है।” लेकिन हम यह नहीं देखते कि उस “यह” के साथ क्या-क्या जुड़ा हुआ है, जिम्मेदारियाँ, डर, अपेक्षाएँ, तुलना, असुरक्षा, तनाव। जीवन की अजीब विडंबना यही है, हर व्यक्ति अपने से ऊपर वाले को देखकर सोचता है, “वास्तव में सुखी तो वही है।” और इसी सोच में वह आज का सुख भी खो देता है।
सच तो यह है दोस्तों, सुख किसी स्थिति का नाम नहीं है, यह एक अवस्था है। सुख का संबंध इस बात से कम है कि आपके पास क्या है, और इस बात से ज़्यादा है कि आपके पास जो भी है आप उसे कैसे देखते हैं। जिस दिन इंसान यह समझ लेता है कि हर जीवन के साथ कुछ न कुछ बोझ बंधा हुआ है, उस दिन तुलना टूटने लगती है और जहाँ तुलना खत्म होती है, वहीं शांति और सुख की शुरुआत होती है।
दोस्तों, इस स्थिति में मुख्य प्रश्न तो यह आता है कि अक्सर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जिसे हम सुखी समझ रहे हैं, वह भी रात को तकिये पर सिर रखकर अपनी ही परेशानियों से जूझता है? हम क्यों मान लेते हैं कि ऊँचा पद, सुकून की गारंटी है; ज़्यादा पैसा, जीवन में चैन सुनिश्चित करता है और ब्रांड वैल्यू या बड़ी पहचान खुशी देती है। जबकि सच्चाई तो यह है कि जीवन में जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, वैसे-वैसे गिरने का डर भी बढ़ता है। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर ऐसा है तो फिर असलियत में सुख है कहाँ? दोस्तों, सुख उस क्षण में है जब आप बिना तुलना के साँस ले पाते हैं। जब आपकी ज़रूरतें आपकी इच्छाओं से कम होती हैं। जब आप कल की चिंता में डूबे बिना, आज को जी पाते हैं। याने सुख उस मन में है जो कह सके, “मेरे पास जो है, उसी में मैं पूर्ण हूँ।”
दोस्तों, जीवन कोई दौड़ नहीं है, जहाँ सबसे आगे वाला ही जीतता हो। जीवन एक यात्रा है, जहाँ जो अपने बोझ को समझकर, अपेक्षाओं को हल्का करके, और आभार के साथ चलता है, वही सच में सुखी होता है। आज बस इतना ही निवेदन है, दूसरों के जीवन को देखकर अपने जीवन को छोटा मत कीजिए क्योंकि हो सकता है, जिसे आप देखकर सोचते हैं “वास्तव में सुखी तो वही है,” वह भी किसी और को देखकर यही सोच रहा हो। और शायद… सुख उसी को मिलता है, जो यह समझ लेता है कि सुख को बाहर नहीं, भीतर ढूँढना होता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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