संवेदनाओं के साथ जिएँ अपना जीवन…
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 8, 2025
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Aug 8, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जब भी हम समभाव, समाजसेवा, नेतृत्व या सफलता की बात करते हैं तो हमारे मन में कुछ सामान्य समाजसेवी लोगों की तस्वीर उभरती है या फिर हमें वे बड़े मंच या बड़े नाम नज़र आते हैं, जिनके साथ तमाम उपलब्धियां जुड़ी हुई हैं। लेकिन इस विषय में मेरा मत थोड़ा अलग है। मेरा मानना है कि उपरोक्त सभी क्षेत्रों में प्रेरणा अक्सर हमारे आसपास मौजूद सामान्य लोगों द्वारा इंसानियत, संवेदनशीलता और कर्तव्य-निष्ठा द्वारा किए गए छोटे-छोटे कार्यों से मिलती है। और हाँ यह असाधारण प्रतिभा और सोच वाले सामान्य लोग हमें किसी भी रूप में मिल सकते हैं। अपनी बात को मैं हाल ही में उत्तरप्रदेश के उन्नाव में घटी एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ, जिसमें भावनाओं से रहित कठोर माने जाने वाले एक पुलिसकर्मी ने सहृदयता और समाजसेवा का भाव दिखाते हुए ना केवल एक छात्रा का भविष्य बचाया बल्कि इस बात का भी एहसास करवाया कि वर्दी में केवल अनुशासन ही नहीं, दिल भी होता है।
चलिए, थोड़ा विस्तार से इस घटना को समझने का प्रयास करते हैं। लखनऊ के रहने वाले मुरारी सिंह अपनी बेटी को आरओ/एआरओ (Review Officer/Assistant Review Officer) की महत्त्वपूर्ण परीक्षा दिलाने उन्नाव लेकर आए थे। ये परीक्षा उन लाखों छात्रों के समान इस बच्ची के लिए भी एक सुनहरा अवसर थी जो शासकीय सेवा में अपना करियर बनाना चाहते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, रास्ता भटक जाने के कारण मुरारी सिंह और उनकी बेटी को महसूस हुआ कि वे समय पर परीक्षा केंद्र नहीं पहुंच पायेंगे। यह विचार घबराहट, तनाव और दबाव बढ़ाने वाला था, जो किसी भी बच्चे और उसके माता-पिता को विचलित करने के लिए काफ़ी था।
इस अवांछित तनाव, दबाव और घबराहट के बीच समय पर परीक्षा केंद्र पहुंचने की चाहत में मुरारी सिंह और उनकी बेटी ने दौड़ लगाना शुरू कर दिया, जिसे उन्नाव के पुलिसकर्मी और कोतवाल श्री सुब्रत त्रिपाठी ने देखा। उन्होंने बच्ची से दौड़ते हुए जाने का कारण पूछा और जैसे ही उन्हें पूरी स्थिति समझ में आई, उन्होंने बिना किसी देरी के अपनी सरकारी गाड़ी बुलवाई और छात्रा को खुद परीक्षा केंद्र तक पहुँचाया।
दोस्तों, इस घटना को सिर्फ एक 'सरकारी गाड़ी से मदद' के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा। यह प्रशासनिक सेवा की असली भावना का उदाहरण है, जो शासकीय सेवा के असली दृष्टिकोण से हमारा परिचय करवाता है। दोस्तों, एक ओर जहाँ अधिकतर अधिकारी नियम और प्रक्रिया की सीमाओं में उलझे रहते हैं, वहीं कोतवाल सुब्रत त्रिपाठी ने ‘मानवता और कर्तव्य’ के बीच संतुलन साधा और एक बच्ची के भविष्य को ख़राब होने से बचाया।
इसे मैंने सेवा का दृष्टिकोण इसलिए कहा क्योंकि सुब्रत त्रिपाठी ने मदद करने का निर्णय लेने से पहले यह नहीं देखा कि नियम क्या कहते हैं, उन्होंने तो बस इतना देखा कि एक बच्ची का भविष्य अधर में है, और समय उसके विरुद्ध चल रहा है और इस वक्त उसे मदद की आवश्यकता है। इस एक विचार ने उन्हें सही निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया और उन्हें एक साधारण पुलिस अधिकारी से विशेष बना दिया।
दोस्तों, यह घटना समाज के हर स्तर को प्रेरित करती है, जो हमें अनेक बातें सिखाती है। जैसे,
1) पुलिस केवल कानून का पालन कराने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज का रक्षक और सहयोगी भी है।
2) मानवता का मार्ग हमेशा सबसे प्रभावी होता है, चाहे आप किसी भी पद या भूमिका में हों।
3) एक छोटी सी सहायता किसी के भविष्य की दिशा बदल सकती है।
4) बच्चों को केवल पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय और मानसिक संतुलन के लिए भी प्रेरणा चाहिए होती है — और यह उन्हें अपने आसपास के समाज से भी मिल सकती है।
दोस्तों, मेरी नजर में यह एक साधारण मदद का उदाहरण नहीं था, यह तो सकारात्मक परिवर्तन की ओर उठाया गया एक ऐसा कदम था जो हमारे समाज को पूर्ण रूप से बदल सकता है। सोच कर देखियेगा, अगर हर सरकारी तंत्र, हर व्यक्ति, हर पदाधिकारी इस तरह की संवेदनशीलता अपनाएं, तो हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहाँ नियम और भावनाएं एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं, वो भी बिना टकराव के।
दोस्तों, कोतवाल त्रिपाठी जैसे अधिकारी हमें यह याद दिलाते हैं कि समाज सेवा केवल बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि हर रोज़ के छोटे फैसलों में छुपी होती है। इसलिए ही मेरा मानना है की अपने कर्तव्यों से आगे बढ़कर इंसानियत की राह चुनना ही सच्ची सेवा है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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