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सबसे बड़ी जीत स्वयं को जीतना है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 days ago
  • 3 min read

July 21, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस बात में कोई शक नहीं है कि आज का मनुष्य पहले से कहीं अधिक शिक्षित, संपन्न और तकनीक से जुड़ा हुआ है। लेकिन उसके बाद भी वह पूर्व की तरह स्वयं पर नियंत्रण रखने में असमर्थ नज़र आता है और मेरी नज़र में जीवन में अपने सपनों को सच ना कर पाने की सबसे बड़ी वजह यही है। याद रखियेगा, इस दुनिया में आज तक जो भी सफल हुआ है, उसने अपने जीवन का सबसे कठिन युद्ध, किसी ओर के नहीं, बल्कि ख़ुद के विरुद्ध लड़ा है। जी हाँ सही पढ़ा आपने, जीवन का सबसे कठिन युद्ध किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, बल्कि स्वयं से लड़ा जाता है। ऐसा मैं इसलिए कह रह हूँ क्योंकि यही युद्ध आपके चरित्र, व्यक्तित्व और भविष्य का निर्माण करता है।


चलिए, इसी बात को हम दूसरे तरीके से समझने का प्रयास करते हैं। अक्सर हम मानते हैं कि इंसान का पैर फिसलता है। लेकिन हकीकत तो यह की इंसान पैरों से ज्यादा आँख, कान, जिह्वा और मन से फिसलता है। अगर आप थोड़ा गहराई से अपने आस-पास देखेंगे तो पायेंगे कि इस दुनिया में कई रिश्ते सिर्फ़ इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि लोग बिना सत्य जाने किसी की भी बात सुन लेते हैं। इसी तरह अनेक लोग गलत रास्ते पर इसलिए चल देते हैं क्योंकि उनकी आँखें आकर्षण और लालच के पीछे भागने लगती हैं। इस दुनिया में कितने ही विवाद केवल इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि जिह्वा पर संयम नहीं रहता। इतना ही नहीं, इंसान की सबसे बड़ी लड़ाई मन से होती है, जो हर पल हमें सुविधा और सही मार्ग के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करता है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में संयम को सबसे बड़ा मानवीय गुण कहा गया है।


इसी बात को समझाते हुए भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसने अपने मन और इंद्रियों को जीत लिया, उसने स्वयं को जीत लिया। और जिसने स्वयं को जीत लिया, उसे संसार की कोई भी परिस्थिति लंबे समय तक विचलित नहीं कर सकती। महात्मा गौतम बुद्ध का जीवन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। राजमहल की सारी सुख-सुविधाएँ उनके पास थीं। यदि वे चाहते तो विलासिता में जीवन बिता सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने मन को बाहरी आकर्षणों का दास नहीं बनने दिया और भीतर की यात्रा को प्राथमिकता दी। इस चुनाव ने उन्हें वर्षों आत्मसंयम के साथ अनुशासित रहते हुए तप करने का बल दिया, जिसने अन्ततः उन्हें बुद्ध बना दिया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि बाहरी विजय से पहले भीतर की विजय आवश्यक है।


दोस्तों, संयम का अर्थ इच्छाओं को मार देना नहीं है। संयम का अर्थ है, अपनी इच्छाओं का मालिक बनना, गुलाम नहीं। जब आपका मोबाइल बजता है और आप जानते हैं कि अभी काम अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए आप स्वयं को मोबाइल उठाने से रोक लेते हैं—यह संयम है। जब कोई आपकी आलोचना करता है और आप तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहने का निर्णय लेते हैं—यह संयम है। जब सफलता मिलने के बाद भी अहंकार आपको छू नहीं पाता और असफलता आने पर भी आप टूटते नहीं—यह भी संयम है। याद रखिएगा, पशु और मनुष्य में सबसे बड़ा अंतर बुद्धि का नहीं, बल्कि आत्मसंयम का है। पशु अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य सही और गलत के बीच चुनाव करने की क्षमता के साथ जीता है। यही क्षमता उसे महान बनाती है।


दोस्तों, आज की दुनिया में प्रतिभा की कमी नहीं है। ज्ञान भी बहुत है, अवसर भी बहुत हैं। लेकिन जो चीज़ सबसे दुर्लभ होती जा रही है, वह है—संयम! और यही कारण है कि अनेक प्रतिभाशाली लोग भी अपनी आदतों, क्रोध, लालच, अहंकार और असंयम के कारण अपने जीवन की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। लेकिन अगर आप अपने जीवन में उन ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं तो प्रतिदिन स्वयं से पूछिए, “आज मैंने किसी और को हराया, या स्वयं पर विजय प्राप्त की?” दोस्तों, जो व्यक्ति अपनी आँखों को गलत देखने से, कानों को गलत सुनने से, जिह्वा को कटु बोलने से और मन को भटकने से रोक लेता है, वही सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और सुखी बनता है। इसलिए हमेशा याद रखिएगा, दुनिया जीतने वाला व्यक्ति शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन स्वयं को जीतने वाला व्यक्ति समय के साथ महान बन जाता है। इसलिए संयम कोई बंधन नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो साधारण इंसान को महापुरुष बना देती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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