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सहनशीलता केवल गुण नहीं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • May 21
  • 2 min read

May 21, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात तो रखना चाहता है, लेकिन दूसरे की बात सुनना नहीं चाहता। हर कोई चाहता है कि लोग उसकी सोच को समझें, उसका सम्मान करें, उसकी भावनाओं को महत्व दें… लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की सोच, भावनाओं और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करते हैं और यहीं से जीवन में संघर्ष शुरू होता है। याद रखिए, हर व्यक्ति आपके जैसा नहीं सोच सकता। हर व्यक्ति का अनुभव, परिस्थिति, संस्कार और जीवन यात्रा अलग होती है। इसलिए मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन किसी से अलग सोच रखने के बावजूद भी उसे सम्मान देना…
यही परिपक्वता है। यही सहनशीलता है और यही एक सभ्य और ऊँचे व्यक्तित्व की पहचान है।


दोस्तों, सहनशीलता का अर्थ यह नहीं कि आप कमजोर हैं। सहनशीलता का अर्थ है कि आपके भीतर इतना धैर्य और आत्मविश्वास है कि आप हर असहमति पर क्रोधित नहीं होते। आज छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं। सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी से लोग दुश्मन बन जाते हैं। परिवारों में संवाद कम और बहस ज्यादा हो गई है। क्यों? क्योंकि हमने “सही होने” को “समझदार होने” से बड़ा बना दिया है। लेकिन सच यह है कि जीवन में हमेशा सही साबित होना जरूरी नहीं होता… कई बार रिश्ते बचाना ज्यादा जरूरी होता है।


दोस्तों, जो व्यक्ति सिर्फ अपने जैसे लोगों के बीच सहज महसूस करता है, उसकी सोच अभी सीमित है। वास्तविक परिपक्वता तब आती है जब हम उन लोगों को भी सम्मान देना सीख जाते हैं जो हमसे अलग हैं। प्रकृति को देखिए, बगीचे में सिर्फ एक ही प्रकार के फूल हों, तो वह सुंदर नहीं लगता। सुंदरता विविधता में है। इसी तरह समाज भी तभी सुंदर बनता है जब अलग-अलग विचार, संस्कृतियाँ और व्यक्तित्व सम्मान के साथ साथ रहना सीखें। आज जरूरत सिर्फ शिक्षित लोगों की नहीं है… जरूरत संवेदनशील और सहनशील लोगों की है क्योंकि ज्ञान हमें बुद्धिमान बना सकता है, लेकिन सहनशीलता हमें इंसान बनाती है।


याद रखिए, कई बार सामने वाला गलत नहीं होता, वह सिर्फ आपसे अलग होता है और हर अलग व्यक्ति दुश्मन नहीं होता।


दोस्तों, सहनशील व्यक्ति अंदर से शांत होता है। वह हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता। वह समझता है कि हर युद्ध लड़ना जरूरी नहीं होता। कुछ लोगों को जवाब शब्दों से नहीं, अपने व्यवहार से दिया जाता है। आज यदि हम अपने परिवार, समाज और कार्यस्थल में शांति चाहते हैं, तो हमें दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलना होगा। हमें सुनना सीखना होगा। समझना सीखना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया सिर्फ हमारी सोच के अनुसार नहीं चल सकती।


अंत में बस एक बात, सहनशीलता केवल दूसरों को स्वीकार करना नहीं है, यह तो अपने भीतर की विशालता को पहचानना है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत रह सके, हर मतभेद में सम्मान बनाए रख सके, और हर इंसान में इंसानियत देख सके, वही वास्तव में परिपक्व और श्रेष्ठ कहलाने योग्य है क्योंकि ऊँची आवाज़ से नहीं, बल्कि उच्च याने अच्छे व्यवहार से व्यक्तित्व महान बनता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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