सहनशीलता सभ्य और सुंदर इंसान की पहचान है…
- Nirmal Bhatnagar

- 2 days ago
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May 15, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, तेजी से बदलती इस दुनिया में हम ज्ञान, तकनीक और सुविधाओं को लगातार बढ़ता हुआ देख रहे हैं। लेकिन कहीं ना कहीं यह भी महसूस कर रहे हैं कि लोगों में सहनशीलता लगातार कम होती जा रही है। लोग अपनी बात तो कहना चाह रहे हैं, लेकिन दूसरे की बात सुनना नहीं चाहते। इसी तरह वे हमेशा अपनी सोच को सही साबित करना चाहते हैं, लेकिन किसी दूसरे के दृष्टिकोण को समझना नहीं चाहते और शायद यही कारण है कि आज रिश्तों में दूरी बढ़ रही है, समाज में तनाव बढ़ रहा है और मनुष्य भीतर से अस्थिर होता जा रहा है।
दोस्तों, सहनशीलता का अर्थ यह नहीं कि आप कमजोर हैं। सहनशीलता का अर्थ है, आप इतने मजबूत हैं कि हर असहमति पर क्रोधित नहीं होते। हर बात पर प्रतिक्रिया देना परिपक्वता नहीं है। कई बार शांत रहना, समझना और दूसरे के दृष्टिकोण को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी होती है। याद रखिए, जो व्यक्ति सिर्फ अपने जैसा सोचने वालो को ही स्वीकार करता है, उसकी सोच अभी बहुत छोटी है। वास्तविक परिपक्वता तब आती है जब हम उन लोगों को भी सम्मान देना सीखते हैं जो हमसे अलग सोचते हैं। उदाहरण के लिए आप दलाई लामा को ले लीजिए, उन्होंने अपना देश छोड़ा, निर्वासन का जीवन जिया, असंख्य कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने भीतर कटुता को जगह नहीं दी। उन्होंने दुनिया को बार-बार यही सिखाया कि घृणा कभी शांति नहीं ला सकती। कल्पना कीजिए, जिस व्यक्ति ने अपना घर, अपनी भूमि और अपना सामान्य जीवन खो दिया हो, अगर वही व्यक्ति दुनिया को करुणा और सहनशीलता का संदेश दे सकता है, तो यह साधारण बात नहीं है।
दलाई लामा कहते हैं, “जब भी संभव हो, दयालु बनिए और यह हमेशा संभव है।” दोस्तों, यह वाक्य सिर्फ सुनने में सुंदर नहीं है बल्कि यह जीवन का गहरा सत्य है। आज हम छोटी-छोटी बातों पर टूट जाते हैं। किसी की एक टिप्पणी हमें परेशान कर देती है। सोशल मीडिया पर किसी की राय देखकर हम क्रोधित हो जाते हैं। लेकिन एक परिपक्व मन जानता है कि हर व्यक्ति अपने अनुभवों, अपने संघर्षों और अपनी समझ के अनुसार सोचता है। इसलिए असहमति होना स्वाभाविक है। जरूरी यह नहीं कि सब हमारी तरह सोचें, बल्कि जरूरी तो यह है कि हम अलग सोच रखने वालो के प्रति भी सम्मान बनाए रखें।
दोस्तों, सहनशीलता सिर्फ समाज को बेहतर नहीं बनाती, यह हमारे भीतर भी शांति पैदा करती है क्योंकि जो व्यक्ति हर समय लड़ने के लिए तैयार रहता है, वह कभी भीतर से शांत नहीं रह सकता। लेकिन जो समझना सीख जाता है, वह धीरे-धीरे जीवन को सरल बना लेता है। अंत में बस एक बात, बड़ा इंसान वह नहीं होता जो हर बहस जीत जाए, बल्कि वह होता है जो रिश्तों को बहस से बड़ा मानता है। इसलिए जीवन में ज्ञान के साथ विनम्रता भी रखिए, तर्क के साथ संवेदना भी रखिए, और अपनी सोच के साथ दूसरों की सोच के लिए सम्मान भी रखिए क्योंकि सहनशीलता सिर्फ एक गुण नहीं, बल्कि यह तो एक सभ्य और सुंदर इंसान की पहचान है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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