अड़ना नहीं, लड़ना सीखिए !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 8 hours ago
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May 7, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज हम अपने बच्चों को पढ़ा तो रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें जीना भी सिखा रहे हैं? हम उन्हें नंबर लाना सिखाते हैं, दूसरों से आगे निकलना सिखाते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें यह सिखाते हैं कि परिस्थितियों से कैसे निपटना है? एक सुंदर अनुभव इस बात को गहराई से समझाता है।
प्रसिद्ध अभिनेता श्री आशुतोष राणा अपने बचपन की एक घटना बताते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें पढ़ाई में खास रुचि नहीं थी। उन्हें कला, खेलकूद और रचनात्मक चीज़ों में ज्यादा आनंद आता था। लेकिन स्कूल में नंबरों का दबाव इतना अधिक था कि वह अक्सर परेशान हो जाते थे। एक दिन गुस्से में उन्होंने अपना स्कूल बैग माँ के सामने फेंक दिया। इसपर माँ ने उन्हें ना तो डाँटा और ना ही गुस्सा किया, उन्होंने बस धीरे से पूछा, “तुम स्कूल क्यों जाते हो?” उन्होंने कहा, “पढ़ने के लिए।” माँ ने फिर पूछा, “पढ़ने से क्या मिलता है?” उन्होंने कहा, “ज्ञान।” माँ मुस्कुराईं और बोलीं, “तो यह बताओ, ज्ञान क्या सिखाता है?” प्रश्न सुन वह चुप हो गए। माँ ने उन्हें समझाते हुए कहा, “ज्ञान हमें दो चीजें सिखाता है, पहला, अड़ना और दूसरा, लड़ना। लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम अड़ना नहीं, लड़ना सीखो।” इसपर उन्होंने पूछा, “माँ! लड़ना मतलब मारपीट?” माँ ने प्यार से समझाया, “नहीं, मारपीट और लड़ने में फर्क होता है। मारपीट में तुम किसी को हराते हो या कोई तुम्हें हराता है। लेकिन असली लड़ाई में तुम किसी को हराते नहीं, तुम उसे जीतते हो।”
कुछ क्षण की खामोशी के बाद उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “अपनी कमजोरियों से लड़ना मतलब उन्हें जीतना, परिस्थितियों से लड़ना मतलब उन पर विजय पाना, शंकाओं से लड़ना मतलब उनसे मुक्त होना।” फिर माँ ने एक और गहरी बात समझाते हुए उनसे कहा, “पढ़ाई बोझ नहीं है, यह जीवन को हल्का करने का साधन है। तुम स्कूल इसलिए नहीं जाते कि सिर्फ प्रश्नों के उत्तर याद करो, बल्कि इसलिए जाते हो कि जीवन की समस्याओं का हल ढूँढ सको।”
दोस्तों, यह सिर्फ एक माँ की सीख नहीं थी… यह जीवन का दर्शन था। आज हम बच्चों पर इतना दबाव डाल देते हैं कि वे परीक्षा में अव्वल आकर भी जीवन में असफल होने का डर लेकर जीते हैं। हम उन्हें अड़ना सिखाते हैं, जिद करना, तुलना करना, दूसरों से आगे निकलना… लेकिन हमें उन्हें लड़ना सिखाना चाहिए, अपने डर से, अपनी सीमाओं से, अपनी कमजोरियों से क्योंकि अड़ने से रास्ते बंद होते हैं, और लड़ने से रास्ते खुलते हैं।
दोस्तों, जीवन में सफलता सिर्फ नंबरों से नहीं आती, वह आती है समझ से, संतुलन से और सही दृष्टिकोण से। इसलिए अपने बच्चों से छोटी बातें मत कीजिए, उन्हें बड़ी सोच दीजिए। ताकि वे बड़े होकर छोटी सोच में न उलझें। अंत में बस एक बात और याद दिलाऊँगा, जीवन में हमें परिस्थितियों से भागना नहीं है; उन्हें समझकर, स्वीकार कर, उनसे आगे बढ़ना है। यही जीवन की असली लड़ाई है और जो यह लड़ाई लड़ना सीख जाता है, वही जीवन में सच्चा विजेता बनता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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