अपना काम करिए और जीवन को अपना काम करने दीजिए…

Oct 17, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, भागदौड़ से भरे इस आधुनिक युग में ख़ुद को दौड़ में बनाए रखने के लिए हममें से ज़्यादातर लोग जीवन जीने से ज़्यादा उसे नियंत्रित करने की कोशिश में परेशान रहते हैं। यानी हम हर परिणाम अपनी योजनानुसार चाहते हैं। जैसे, लोग हमारी उम्मीदों के अनुसार व्यवहार करें, मेहनत का परिणाम वैसा ही आए, जैसा हमने सोचा है और भविष्य भी हमारे अनुमान के मुताबिक हो। यानी हर चीज़ हमारी उम्मीदों और योजनाओं के अनुसार घटित हो।
इस प्रयास में हम जीवन की इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि हम सिर्फ़ अपने प्रयासों को नियंत्रित कर सकते हैं, परिणामों को नहीं। और शायद यही ग़लत प्रयास हमारे जीवन में उपलब्धियों से ज़्यादा चिंता भर देता है। आप खुद गंभीरता से सोचकर देखिए, जो हुआ ही नहीं है, उसे लेकर हर समय परेशान रहना। बार-बार यह सोचना कि आगे क्या होगा? लोग क्या कहेंगे? अगर योजना सफल नहीं हुई तो? अगर चीज़ें बिगड़ गईं तो? अगर टीम ने ठीक से काम नहीं किया तो? क्या इन सवालों के बारे में लगातार सोचते रहने और परेशान होते रहने से हम ख़ुश रह पाएँगे? शायद नहीं! बल्कि भविष्य की चिंता करते-करते हम अपना आज भी ठीक से नहीं जी पाते। जिस बात का अभी कोई अस्तित्व ही नहीं है, उसके बारे में सोचकर हम उस पल की शांति भी खो देते हैं, जो हमारे पास अभी है।
सच तो यह है कि भविष्य को बेहतर बनाने की चिंता में हम अक्सर अपना आज ही खो देते हैं। हर चीज़ को अपनी उम्मीद के मुताबिक करने और हर सवाल का जवाब पहले से जानने की कोशिश में हम जीवन को जीने के बजाय उसे नियंत्रित करने में लगे रहते हैं।
इसलिए याद रखिए, भविष्य के लिए योजना बनाना ज़रूरी है, लेकिन उसकी चिंता में अपने आज की ख़ुशी खो देना सही नहीं है। क्योंकि जीवन भविष्य में नहीं, आज में घट रहा है।
जीवन के इसी सूत्र को समझाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता जी में कर्म को प्रधान बताते हुए, परिणाम की अपेक्षा न रखने की बात कही है। यहाँ हमें बस इतना समझना होगा कि परिणाम की अपेक्षा न रखने या उसे छोड़ देने का अर्थ हार मान लेना नहीं है। इसका अर्थ तो सिर्फ़ इतना है कि अपने काम को पूरी ईमानदारी से करने के बाद, जो भी परिणाम आए, उसे स्वीकार करने का साहस रखना। दूसरे शब्दों में कहूँ तो, जिन चीज़ों या परिणामों को हम पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते, उन्हें स्वीकार करने का साहस रखना ही जीवन की समझदारी है।
यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है, जैसे बीज बोना और उसे खाद-पानी देना हमारे हाथ में होता है, लेकिन पेड़ कब और कितना बढ़ेगा, मौसम कैसा होगा और फल कब आएगा, ये सब हमारे नियंत्रण में नहीं होता। इसलिए हमें अपनी ऊर्जा उन चीज़ों पर खर्च नहीं करनी चाहिए, जो हमारे हाथ में नहीं हैं। इसके बजाय, हमें अपना पूरा ध्यान उन कामों पर लगाना चाहिए, जिन्हें हम बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
प्रतिष्ठित लेखिका एटी हिलेसुम ने इस गहरी बात को बड़े सुंदर तरीक़े से समझाते हुए कहा है, “कभी-कभी पूरे दिन की सबसे ज़रूरी चीज़ दो गहरी साँसों के बीच लिया गया थोड़ा-सा विश्राम होती है।” दोस्तों, जीवन में हमेशा आगे भागना आवश्यक प्रतीत होता है, जबकि वो ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी दो गहरी साँसों के बीच लिया गया छोटा-सा विराम हमें वह स्पष्टता दे सकता है, जो घंटों की बेचैनी नहीं दे पाती। इसलिए जब आपको अपना मन उलझा हुआ लगे तो एक क्षण रुकिए और एक गहरी साँस लेकर ख़ुद से पूछिए, “इस समय वास्तव में मेरे नियंत्रण में क्या है?” शायद आपका प्रयास; आपका व्यवहार; आपका निर्णय; आपकी प्रतिक्रिया। जो भी जवाब मिले, बस वहीं अपनी ऊर्जा लगाना शुरू कर दीजिए और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखते हुए बाकी सभी कार्यों या अपेक्षाओं को थोड़ा समय दीजिए। कई बार ज़िंदगी हमे मनमाफिक परिणाम ना देकर हराना नहीं चाहती है, बल्कि वो हमें हमारी अपेक्षा से अधिक बड़ा लाभ देना चाहती है। यानी उसके पास हमेशा हमारे लिए कोई दूसरा रास्ता होता है, जिसे हम अभी देख नहीं पा रहे होते है। इसलिए हर बंद दरवाजे को अंत मत समझिए। हर देरी को असफलता मत मानिए। हर बदलाव को नुक़सान मत समझिए। ऐसी स्थिति में बस ख़ुद को याद दिलाइए कि कभी-कभी जीवन हमें उस दिशा में ले जा रहा होता है, जिसे हमारी अधीरता समझ नहीं पाती।
दोस्तों, इसीलिए कहते हैं, “जो वास्तव में आपके लिए है, वह आपसे कभी छूटेगा नहीं।” बस इसे भविष्य की गारंटी समझने के स्थान पर भरोसे की याद समझिएगा। जो आपके जीवन के लिए सही होगा, उसके लिए खुद को तोड़ देने जितनी बेचैनी ज़रूरी नहीं।अपनी कोशिश पूरी ताकत से कीजिए। लेकिन परिणाम को हर पल कसकर पकड़कर मत बैठिए। कुछ चीज़ें प्रयास से मिलती हैं और कुछ चीज़ें स्वीकार करने से समझ आती हैं। इसलिए आज थोड़ा धीमे चलिए। एक गहरी साँस लीजिए। अपनी चिंताओं को कुछ देर के लिए नीचे रखिए और खुद से कहिए, “मैं अपना काम कर रहा हूँ। बाकी जीवन को अपना काम करने देता हूँ।” शायद उसी क्षण ज़िंदगी आपको कुछ ऐसा दिखा दे, जिसे आपकी चिंता अब तक छिपाए हुए थी। दोस्तों, कई बार ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत मोड़ तब आता है, जब हम नियंत्रण की अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करते हैं और विश्वास के लिए थोड़ी जगह बनाते हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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