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पुराने दिन कभी लौटकर नहीं आते…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
2 days ago
3 min read

Oct 13, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस दुनिया में आप हर चीज़ की कीमत चुकाते हैं, बड़े होने की भी। जी हाँ, इस बात का एहसास मुझे हाल ही मैं अपनी उज्जैन यात्रा के दौरान उस वक्त हुआ, जब मैं फ्रीगंज स्थित उस गली से गुज़रा जहाँ मेरा बचपन बीता था। यानी जहाँ मैंने अपने जीवन के 36 वर्ष गुज़ारे थे। अपने उस मोहल्ले से गुज़रते वक्त वहाँ मौजूद घर मुझे बचपन के दोस्तों की याद दिला रहे थे, तो पीपल का पेड़ उनके साथ खेले गए क्रिकेट की, तो कुछ चीजें अपने कंप्यूटर के व्यवसाय की। सब कुछ देखकर ऐसा लग रहा था, काश, एक बार फिर वही दिन लौट आएँ। यानी वही घर… वही आँगन… वही गर्मियों की छुट्टियाँ… वही दोस्तों के साथ शामें… वही बिना किसी बड़ी चिंता के बीतते दिन।


दोस्तों, बड़े होने की एक अजीब-सी सच्चाई है, हम अक्सर उस घर के लिए तरसते हैं, जहाँ अब हम लौट ही नहीं सकते। कभी-कभी किसी पुराने मोहल्ले से गुज़रते हुए, बचपन की कोई तस्वीर देखकर या किसी पुराने गीत को सुनकर अचानक मन कहता है, “काश, एक बार फिर वही दिन लौट आएँ!” जैसा उस दिन मेरे साथ हुआ था। लेकिन उसके अगले ही क्षण मुझे यह भी एहसास हुआ कि जिस जगह को मैं याद कर रहा था, वह जगह तो आज भी वहीं मौजूद थी। यानी घर वहीं खड़ा था, सड़क वहीं थी, पेड़ भी वहीं था… लेकिन अब ना तो वो समय है और ना ही हम वैसे हैं। शायद यही बड़े होने का सबसे बड़ा अनकहा दर्द है।


दोस्तों, सोच कर देखियेगा, हम उस जगह के लिए नहीं बल्कि अपने उस पुराने जीवन के लिए व्याकुल होते हैं, जो वहाँ कभी रहता था। यानी वह बच्चा जिसे छोटी-सी चीज़ में खुशी मिल जाती थी। वह युवा जिसे भविष्य की इतनी चिंता नहीं थी। वह मन जो रिश्तों को हिसाब-किताब से नहीं, अपनेपन से देखता था।


दोस्तों, बड़े होते-होते हमारे पास बहुत कुछ आ जाता है। जैसे पद, पैसा, पहचान, संपत्ति, जिम्मेदारी, उपलब्धि, अनुभव, आदि। लेकिन उसी के साथ कुछ चीजें पीछे छूट जाती हैं। समय कम हो जाता है, मुलाकातें कम हो जाती हैं और कई रिश्ते तस्वीरों में सिमट जाते हैं। तब समझ आता है कि बचपन की असली ख़ूबसूरती महंगे खिलौनों या छुट्टियों में नहीं थी। ख़ूबसूरती उस बेफ़िक्री में थी, जिसमें खुशी के लिए बहुत कुछ चाहिए ही नहीं होता था। लेकिन अतीत में लौटना अब संभव नहीं है और शायद यही जीवन की ख़ूबसूरती भी है। अगर हर चीज वापस मिल सकती, तो फिर समय की कीमत ही क्या होती?


दोस्तों, हम पुराने घर में लौट सकते हैं, लेकिन पुरानी शाम में नहीं। पुराने दोस्तों से मिल सकते हैं, लेकिन उनके साथ बिताया वही बचपन वापस नहीं पा सकते। माता-पिता के साथ बैठ सकते हैं, लेकिन बचपन में उनकी गोद में बिताए वे दिन दोबारा नहीं जी सकते। इसलिए अतीत को पकड़कर बैठने से कोई फ़ायदा नहीं है, बल्कि उससे सीखकर अपने वर्तमान को बेहतर बना लेना ज़्यादा बेहतर है। अगर बचपन में रिश्तों में अपनापन था, तो आज अपने परिवार के लिए थोड़ा समय निकालिए। अगर तब छोटी चीजों में खुशी मिलती थी, तो आज छोटी खुशियों को नोटिस कीजिए। अगर तब शामें दोस्तों के नाम थीं, तो कभी फोन हटाकर किसी दोस्त के साथ सचमुच बैठिए। संभव है हम उस पुराने घर में कभी वापस न जा सकें, लेकिन उस घर जैसा अपनापन अपने आज में ज़रूर बना सकते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि अतीत की स्मृतियों (nostalgia) के सही अर्थ को समझने का मतलब सिर्फ़ इतना समझ जाना है कि अतीत हमें बुलाने नहीं आता; वह तो हमें याद दिलाने आता है कि हमने कभी कितना सुंदर जीवन जिया था।


इसलिए दोस्तों, अगली बार जब कोई पुराना गीत सुनकर मन उदास हो जाए, तो उस उदासी को मुस्कान में बदल दीजिए और कहिए, “वह समय तो वापस नहीं आएगा, लेकिन उसकी ख़ूबसूरती आज भी मेरे भीतर जीवित है।” क्योंकि जिंदगी का अर्थ केवल आगे बढ़ना नहीं है। बल्कि आगे बढ़ते हुए पीछे छूट गई खूबसूरत चीज़ों को अपने भीतर सम्भालकर रखना भी जिंदगी का हिस्सा है।


दोस्तों, वह घर, स्कूल के दिन, कॉलेज की मस्ती, जीवन की शुरुआती चुनौतियाँ आदि अब कभी लौटकर नहीं आएगी। यानी समय अब कभी लौटकर नहीं आएगा। लेकिन उसकी खुशबू, उसकी यादें और उस समय का हमारा निश्छल मन, आज भी हमारे भीतर कहीं मौजूद है। बस ज़रूरत है, कभी-कभी जिंदगी की भागदौड़ से बाहर निकलकर वहाँ थोड़ी देर बैठ आने की। इसलिए ही तो मैं रोज़ कहता हूँ, फिर भी… ज़िंदगी हसीन है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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